"खाईश् नही जीने की, पर जिये जा रहे हैं,
ज़हर ज़िंदगी का बस, हम पिये जा रहे हैं,
छोड़ दिया दामन, उम्मीदों का अब हमने,
ज़ख़्म ज़िंदगी का, बस हम लिए जा रहे हैं"
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"खाईश् नही जीने की, पर जिये जा रहे हैं,
ज़हर ज़िंदगी का बस, हम पिये जा रहे हैं,
छोड़ दिया दामन, उम्मीदों का अब हमने,
ज़ख़्म ज़िंदगी का, बस हम लिए जा रहे हैं"
जब तक मनुष्य धर्म/ जाती/ लिंग् के आधार पर भेद भाव करना बंद नही करेगा तब तक देश ही नही संसार मे मानवता शर्मसार होती रहेगी, हर स्त्री पुरुष को ये समझना चाहिए जानना चाहिए की ये देह आत्मा का एक वस्त्र मात्र है, जब ये वस्त्र पुराना खराब हो जाता है तब आत्मा नवीन देह रूपी वत्र धारण करने चली जाती है, अर्थात जब आत्मा को इसका मोह नही तो तुम मोह क्यों करते हो, क्यों जाती धर्म लिंग् के आधार पर लड़ते घ्राणित कार्य करते हो, तुम खुद भी एक जीव आत्मा हो और जिसकी निंदा कर रहे हो जिसका गलत कर रहे हो वो भी एक जीव आत्मा है, आखिर क्यों तुम अपने अहंकार या अग्यानवश् जाती धर्म लिंग् के आधार पर व्यभिचार गलत आचरण करते हो, आध्यात्म हमें सिखाता है ईश्वर एक है और समस्त जीव आत्मा उस परमात्मा से निकली और ऊर्जा प्राप्त करती है, सांझेप में कह सकते है सूक्ष्म धागे से परमात्मा से बंधी रहती है, जैसे ईश्वर और परमात्मा किसी जाती धर्म लिंग् से ताल्लुक नही रखते वैसे आत्मा नही रखती न ही उसमे इंद्रियाँ होती है जो भाव प्रकट कर सके किंतु देह मे इंद्रियाँ होती है पर इन पर नियंत्रण की शक्ति भी केवल मनुष्य के पास है तभी पशु और मनुष्य मे अंतर है किँतु आज मनुष्य केवल देह से मनुष्य बनता जा रहा है अंदर से पशु हो रहा है, जाती धर्म लिंग् भाषा वेश भूषा बाहरी आवरण पर ही अब उसकी इंसानियत ठहर चुकी है, आज मानव बस देह से मानव है तभी अपराध चरम पर और इंसानियत शर्मसार हैं।।
मौसम की तरह कभी तुम न बदल जाना,
पास आ कर मेरे, कभी दूर मत चले जाना
जो दिखाये सपने, तुमने साथ चलने के मेरे,
तोड़ कर उन्हें ,यु मसल के मत चले जाना,
चलते चलते, इन राहों पर बहुत गिरे हम
रोते रहे कुछ वक़्त, फ़िर उठ खड़े हुए हम,
दर्द देती रही ज़िंदगी, इस मेहफिल में हमें
दर्द सह कर भी देखो, कैसे मुस्कुराते रहे हम,
यु तो टूट कर , बिखरी 'मीठी- ख़ुशी' के लिए
मोहब्बत के सारे ज़ख्म, अकेले सहते गए हम,
अंधेरे में फ़िर, उजाले की हसरत कर बैठे थे
नादाँ थे जो पत्थरो को, इंसां समझ रहे थे हम,
बस हसरत नही रही थी, यु खुलकर हँसने की
इसलिए अब, इश्क की राहों से बचे हुए थे हम,
हमने अक्सर चार युगों के बारे मे सुना है, ये चार युग है क्या? आज इसके बारे में जानते हैं, ये चार युग ब्रह्मांड की वो चार अवस्थाएँ खासकर हमारे सौर मंडल की चार अवस्थाएँ है, प्रथम अवस्था शिशु अवस्था जिसे सतयुग कहा जाता है, शिशु के समान तब वहा लोगों का जीवन और स्वभाव था, तभी आज भी शिशु को भगवान् स्वरूप कहते हैं, दूसरी अवस्था त्रेता युग, जो बालक समान व्यवहार था उस काल के मनुष्यों का, कुछ बालक झूठे मक्कार स्वार्थी चोरी करने वाले क्रोधी और तमाम गलत कृत्यो मे विलीन हो जाते हैं किंतु कुछ अच्छे कर्म और सौम्य रूप से बाल्यावस्था को जीते हैं, द्वापर युग, ek युवा युग, जिसमे एक वयस्क व्यक्ति के समान स्वार्थ, छल कपट, द्वेष, व तमाम बुराइयाँ है, तो वही कुछ लोग अछाइयों के साथ जी तो रहे हैं पर कठिनता से, कलियुग अर्थात वृथावस्था, अर्थात सब कुछ देख लिया जी लिया, अब खत्म होने की कगार पर है पर उतना ही अहंकार, मोह छल कपट व बुराइयाँ है, जो युवा अवस्था मे नही हासिल कर सके वो वृधावस्था मे हासिल करने की अंधी दौड़।
सत्य तो ये है, हर व्यक्ति आज भी इन चार युगो को जी रहा है, जब उसका जन्म होता है तब वो शिशु अवस्था मे सतयुग मे जीता है, उसके अंदर कोई छल कपट बुराई नही होती, वही बाल्यावस्था मे वो त्रेता युग मे जीता है जहाँ वो झूठ बोलना चोरी करना पाप करना और तमाम काम सीखता है, कुछ अच्छे कर्म भी सीखता है वही गलत भी और जो सीखता है उसका अनुसरण करता है, वही द्वापर युग मे आकर यानी युवा अवस्था मे आकर जो अब तक सीखा उसमें पूरी तरह perfect हो जाता है और वैसा व्यवहार करता है, अच्छे व्यक्ति अच्छा करते हैं पर कितना भी अच्छा कर ले कही न कही मलिनता उनके व्यवहार मे रहती ही है और जिन्होंने गलत सीखा है वो पूर्ण रूप से उसका पालन करते हैं और कभी सुधारते नही और न अपने गलत कर्म पे कोई पछतावा करते हैं, वही कलियुग यानी वृधावस्था इस अवस्था मे मे भी इनका व्यवहार वैसा ही होता है जैसे युवा अवस्था मे था, अच्छे कर्म के व्यक्ति गरीब दुःखी अकेले और जीवन को ढोते है वही धूर्त व्यभिचारी तुच्छ सोच के व्यक्ति जो पहले कर रहे थे वही करते हैं और जो युवा अवस्था मे न कर सके वो करने मे लगे रहते हैं।
इसलिए आज भी हर व्यक्ति ये चार युग जीता है
तेरे बिन जीना सीख लिया
तेरे बिन रहना सीख लिया
तू रहे खुश जहाँ मे सदा
बिन तेरे खुश होना सीख लिया