Thursday, 19 April 2018

ईश्वर वाणी-247, वास्तविक आयु

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यद्धपि तुम अपनी भौतिक देह के आधार पर किसी की आयु तय करते हो लेकिन अपनी व अन्य जीवों की वास्तविक आयु जानते हो??

हे मनुषयो तुम्हारी आयु भी इतनी ही  है जितनी इस ब्रह्मांड की, क्योंकि तुम केवल भौतिक देह देख कर ही आयु तय करते हो तो अब सोचोगे की इतनी आयु कैसे हुई हमारी, तो तुम्हें बताता हूँ जैसे तुम्हारा बालक चाहे पुराने वस्त्र पहने या नया किंतु तुम जानते हो कि उसकी आयु क्या है न कि पहने वस्त्र के आधार पर तय करते हो, वैसे ही ये शरीर भी आत्मा का वस्त्र है और आत्मा मेरी सन्तान, तो ये जो भी वस्त्र धारण करे मुझे इसकी वास्तविक आयु पता है।

ब्रह्मांड के उदय के समय से है ही मैंने अपने अंशो द्वारा आत्मा का जन्म करवाया, ये आत्मा न सिर्फ मनुष्य में अपितु समस्त जीव जंतुओं पेड़ पौधों और यहाँ तक कि समस्त ग्रह नक्षत्रों में भी है।
तुम्हारे भौतिक शरीर की उतपत्ति से पूर्व मैंने ग्रह नक्षत्रों की उतपत्ति की, उन्हें जीवन्त रहने के लिए आत्मा को उसमे स्थान दिया ताकि सदियों तक वो जीवित रह कर समस्त ब्रमांडनिये नियमो का पालन कर सके, तत्पश्चात पेड़ पौधे व जीव जन्तुओं का जन्म मानव का जन्म हुआ किंतु  ये जन्म केवल वस्त्र बदलने के समान है, वास्तविक जन्म तो सृष्टि के जन्म के साथ ही हो चुका है तुम्हारा।
हे मनुष्य जो आज तुम्हारे माता पिता है पिछले किसी जन्ममें तुम्हारी संतान थे, वैसे ही भाई बहन बंधु सखा सब पिछले कई जन्मों से तुमसे जुड़े है और आगे भी रहेंगें।

हे मनुषयो ये न भूलो तुम्हारी तरह सभी ग्रह नक्षत्र जीवित है और इनमें भी तुम्हारी भाती आत्मा विराजित है बस फर्क ये है तुम कई बार जन्म ले चुके हो अर्थात शरीर रूपी वस्त्र बदल चुके हो किन्तु इन्होंने तुम्हारी जितनी जल्दी वस्त्र नही बदले है लेकिन इसका मतलब ये नही की ब्रह्मांड में इनको हानि पहुचाये। यद्धपि तुमने कई आकाशीय घटना देखी होंगी जिनमे नक्षत्रो को टूट कर नष्ट होना फिर नए नक्षत्र का उदय देखा होगा, ये सब तुम्हारे ही भौतिक शरीर की भांति है ये, किन्तु आत्मा उतनी ही पुरानी अर्थात इसकी आयु उतनी ही जितनी तुम्हारी।

हे मनुष्यों मैं पहले भी बता चुका हूं और आज भी बताता हूं कि समस्त पृथ्वी सम्पूर्ण ब्रमांड का प्रतीक है, इस संसार के समस्त जीव जंतु भी आकाश के ग्रह नक्षत्रों के ही समान हैं, जैसे आकाश में निम्न ग्रह नक्षत्र जन्म लेते व नष्ट होते रहते हैं वैसे ही भौतिक देह लिए समस्त जीव जंतु हैं चाहे वो जलचर हो, थलचर हो अथवा आकश में उड़ने वाले पक्षी, चाहे रेंगने वाले जीव, पेड़ पौधे, वनस्पति, मनुष्य सभी आकाशीय ग्रह नक्षत्रों के समान है।
हे मनुष्यों तुम्हारे दादा-दादी नाना-नानी उस आकाशगंगा के समान है जिसमे तुम्हारे माता पिता भाई बहन व अन्य परिजन रहते हैं, साथ ही तुम्हारे मित्र व पड़ोसी तुम्हारे नजदीकी ग्रह व आकाशगंगा हैं। इसलिए जैसे तुम जीवित हो और घर रूपी आकाश गंगा में रहते हों वैसे ही समस्त ग्रह नक्षत्र जीवित है और परिवार रूपी आकाशीय आकाशगंगा में रहते हैं व अपने भौतिक आकाशीय नियमो का पालन करते हैं और सदियों तक करते रहेंगे।

हे मनुष्यों इसलिये भौतिक देह से किसी को मत आंको, यदि तू ऐसा त्याग देगा तब तुझे वास्तविक आयु पता चलेगी व छोटे बड़े का भेद खत्म होगा क्योंकि आत्मिक स्तर पर सब समान है, किँतु इसका अभिप्राय रिश्तो की मर्यादा व उनके नाम से जोड़ कर न देखे क्योंकी उनका तो पालन तुम्हे करना ही है क्योंकि हर रिश्ता इस भौतिक देह से जुड़ा है और देह आत्मा से और दोनों मिलकर कर्म से जुड़े हैं।"

कल्याण हो

ईश्वर वाणी-246, संसार की डोर

ईश्वर कहते है, "हे मनुष्यों यद्धपि तुममे से कितने ही लोग पुनर्जन्म में विश्वास नही रखते हो, किसी की वजह धार्मिक मान्यता के आधार पर होती है कि उसकी धार्मिक पुस्तक ये नही कहती कि पुनर्जन्म होता है तो अर्थ इसका नही होता किंतु आज तुम्हे बताता व उनसे पूछता हूँ जो धार्मिक पुस्तक के आधार पर ये कहते हैं कि पुनर्जन्म नही होता, क्योंकि यदि इन्होंने वो पुस्तकें ठीक से पड़ी है तो उनमें मेरे ही अंश के पुनः जन्म लेने की बात कहि गयी है और यदि पुनर्जन्म नही होता तो क्या मेरा ही अंश क्या पुनः फिर जन्म ले सकता था।
साथ ही जो व्यक्ति वैज्ञानिक आधार पर या नास्तिक बन कर ये कहते हैं पुनर्जन्म नही होता तो उन्हें में अज्ञान ही  कहूँगा क्योंकि यदि वो ज्ञानवान होते तो सर्वप्रथम 'वायु' का रंग क्या है संसार के समक्ष ला चुके होते अर्थात जिन्हें वायु का रंग, ब्राह्मण का आकार, ब्रह्मांड में निरन्तर विचरण कर रहे पत्थर, ग्रहों के आकार आदि के विषय मे सही जानकारी होती तब ये कहते पुर्नजन्म नही होता तो सोचनीय होता।

मनुष्य खुद को बहुत ज्ञानी समझता है किंतु मेरी  बनाई सृष्टि को सुई कि नोक जितना भी नही जान सका है और न सकेगा।

संसार मे मनुष्य केवल भौतिक देह, क्षेत्र, भाषा, सभ्यता, संस्कृति, रंग, रूप, लिंग, अमीर गरीब, जाती, सम्प्रदाय आदि  के आधार पर किसी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन कर अपने बराबर व ऊँचा व नीचा ठेराता है, वैसे ही मेरे अंशों द्वारा दिये गए मानव जाति को एक ही भ्रातत्व भाव के सूत्र में बांधने व मानव व जीव कल्याण हेतु दिए वचनों को केवल विशेष धर्म से जोड़ कर देखना मानव जाति की बड़ी भूल है क्योंकि यदि इंसान ऐसा करता है तो वो जताता है कि वो केवल भौतिक देह को ही सच मानता है इसलिए उसने केवल भौतिक देह और उससे मिलने वाले वचनों पर यकीन किया किंतु यदि वो आत्मा को सत्य मानता तो मेरे अंशो द्वारा देश काल परिस्थिति के अनुसार दिए वचनों कोही सही मानता व प्राणी जाती कल्याण हेतु कार्य करता।

हे मनुष्यों संसार की समस्त वस्तुये एक दूसरे से जुड़ी है जैसे शरीर से आत्मा, जल से जीवन, प्रेम से मित्रता इत्यादि वैसे ही ब्रह्मांड में हर ग्रह एक दूसरे से जुड़े है व समस्त ग्रह आकाशगंगा से व आकाशगंगा समस्त ब्रमांड से जुडी है और ब्रमांड हमसे जुड़ा है अर्थात तुम सब मुझसे जुड़े हो,में एक मदारी हूँ जिसकी डोर सदा मेरे हाथ में है सदियों से और सदा रहोगे मुझसे जुड़ कर क्योंकि मैं ईश्वर हूँ ।

कल्याण हो



Monday, 16 April 2018

ईश्वर वन्दना-मिल जाय तुम प्रभु

तुझे पुकारता है दिल मेरा, आओ दिलमे प्रभु
तुझे ढूंढता है मन मेरा, मिल जाओ तुम प्रभु-2

किस रास्ते पर चलु मैं, किस राह को चुनु मैं
खड़ा इस चौराहे पर, किस ओर फिर मुडु मैं-2

हूँ असमंजस में ऐसे, किस राह में तुझे चुनु मैं
न पता मुझे कुछ, मुझे तो समझाओ तुम प्रभु-2

भक्ति का न पता है मुझे, धर्म से है कोई वास्ता
दिखा तू ही मुझ हे प्रभु, सत्य का सही वो रास्ता-2

किस नाम से पुकारूँ तुझे, कैसे करूँ आराधना
बस है आस्था दिलमे, अपनाओ मुझे तुम प्रभु-2

ठुकराया गया हूँ बहुत में, चोट लगी हर मोड़ पर
मरहम लगा दो प्रेम का, दिलमे आओ यू प्रभु-2

तुझे पुकारता है दिल मेरा, आओ दिलमे प्रभु
तुझे ढूंढता है मन मेरा, मिल जाओ तुम प्रभु-4

Saturday, 14 April 2018

ईश्वर वाणी-245,जीव हत्या, बलि, अनन्त जीवन

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यद्धपि तुम मुख के स्वाद हेतु जीव हत्या करते हो, यद्धपि तुम मुझे प्रसन्न करने हेतु बलि शब्द का सहारा ले निरीह जीवो की हत्या करते हो, किन्तु क्या तुम्हें वास्तव में लगता है कि मैं इनसे प्रसन्न हो सकता हूँ।
हत्या चाहे मेरे नाम से बलि रूप में किसी निरीह जीव की तुम करो अथवा जीभ के स्वाद हेतु, इन सबसे में तुमसे कभी प्रसन्न नही हो सकता जैसे 'कोई तुम्हारा मित्र या रिश्तेदार तुम्हें प्रसन्न करने हेतु तुम्हारे ही किसी बालक की हत्या कर तुम्हारे समक्ष उसके मास से बने लज़ीज़ व्यंजन तुम्हें खाने को दे तो क्या तुम उस भोजन को खा कर उस मित्र या रिश्तेदार से प्रसन्न होंगे या क्रोधित होंगे??
सम्भव है क्रोधित होंगे तो मुझसे ये आशा कैसे करते हो कि मैं प्रसन्न होऊँगा इनसे, आखिर मैंने सिर्फ मनुष्य नही बनाये अपितु समस्त जीव जंतु बनाये हैं, यदि तुम मुझे अपना जनक मानोगे न कि अपने भौतिक माता पिता को तो निश्चित ही जानोगे संसार के सभी जीव तुम्हारे भाई बहन व तुम्हारे अपने है और उनको कष्ट न दोगे।

हे मनुष्यों में पहले ही बता चुका हूँ और आज भी बताता हूँ यद्धपि मेरे अंशो ने तुम्हे ये बताया हो कि की मानव जन्म एक बार ही होता है किंतु इसका अभिप्राय ये नही की पुनर्जन्म नही होता, मानव जन्म इसलिए मिला ताकि अपने समस्त पापो प्रायश्चित कर मुझमे लीन हो कर अनन्त जीवन पाओ व मोक्ष को प्राप्त हो।
हे मनुष्यों तुम अपने जीवन मे जितनी बार भी मास खाते हो, उसके लिए जीव की हत्या करते हो, मेरे नाम पर बलि दे कर जीव की हत्या करते हो,मच्छर, मक्खी, चीटी आदि की जाने अनजाने हत्या करते हो, उतनी ही बार तुम्हें जन्म लेना पड़ता है उसी रूपमें जिस रूप में जितनी बार तुमने इनकी  हत्या की है, तत्पश्चात उस पीड़ा को झेल कर पुनः मानव देह व सुखमय जीवन को प्राप्त होते हो।
किंतु निम्न रूपो में लिया जन्म व उनमे मिले कष्ट ही वास्तविक नरक है और इसके पश्चात जब तुम्हरी आत्मा पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाती है तबपुनः एक सुखमय स्वस्थ मानव जीवन पाती है ताकि पुराने सारे कष्ट  भूल कर अच्छा  जीवन जियो किंतु मेरे बताये मार्ग पर चल कर मोक्ष प्राप्त कर अनन्त जीवन को पाओ।
हे मनुष्यों प्रत्येक जीव आत्मा देह त्यागने के बाद नए जीवन के लिए तड़पती रहती है और कोशिश करती है कि श्रेष्ट सुखमय मानव जीवन को पाये लेकिन उसके कर्म ही निश्चित करते हैं कि किस शरीर मे किस देश मे और कब उसको क्या स्थान प्राप्त होगा साथ ही दुख सुख सबकुछ उसके अपने वर्तमान व पिछले जन्म के कर्म तय  करते हैं, तभी तुमने देखा होगा कोई मनुष्य अच्छे कर्म करता है फिर भी दुख पाता है जबकि कोई बुरे कर्म करने वाला सुख पाता है, कारण पिछले जन्म के कर्म लेकिन अच्छे कर्म करने  वाला अपने नए जीवन के लिए सुख कमा रहा है वही बुरे कर्म वाला दुःख।

हे मनुष्यों अब तुम खुद तय करो कि तुम्हें क्या चाहिये, किन्तु ये अवधारणा त्याग दो की जीवन एक बार ही मिला है, हाँ मानव जीवन अवश्य एक बार मिला है, किंतु दूसरी बार अनेक कष्ट और रूपो में जन्म लेने के बाद यदि तुम्हारी आत्मा शुद्ध हुई तो पुनः जन्म मिलेगा ताकि अच्छे कर्म कर मोक्ष रूपी अनन्त जीवन को पाओ,किंतु तुम यदि ऐसा नही करते तो युही जन्म जन्मो तक भटकते रहोगे और कष्टों को भोगोगे।"

कल्याण हो

Friday, 13 April 2018

ईश्वर वाणी-244, मेरे अंश

ईश्वर कहते हैं, “यद्धपि मैंने ही श्रष्टि व जीवन का निर्माण किया है किंतु आज तुम्हें मैं बताता हूँ वो सत्य जिसे तुम मानव नही जानते तथा सदा भृम में रह कर असत्य का अनुसरण कर मानव को मानव का शत्रु बनाते हो।
हे मनुष्यों मैं जीवन मे प्रथम, आत्मा में प्रथम, सत्य, निराकार, अनन्त और अविनाशी हूँ, शक्ति में सर्वशक्तिशाली अनन्त जीवन का दाता परमेश्वर हूँ, हे मनुष्यों मैंने ही अपने अंशो का सबसे पहले खुद से ही निर्माण अर्थात जन्म दिया, जिन्हें तुम देश, काल, परिस्थिति, भाषा, सभ्यता, संस्कृति के अनुसार अनेक नामो से जानते हो तथा निम्न रूपो में जानते व मानते हो। किंतु उन्ही अंशो ने समस्त ब्रमांड व जीव जंतुओं का निर्माण मेरे कहने व आज्ञा के अनुसार किया।
जैसे गंगा जल गंगा नदी से निकाल कर किसी बर्तन में भर देने पर भी गंगा जल ही रहता है, अब चाहे गंगा नदी से कितने ही बर्तनों में उसे भर ले, हर बर्तन में रखा जल गंगा जल ही कहलायेगा, अब इस बर्तन में भरे जल का भी उतना ही महत्व है जितना गंगा नदी में बहते हुए जल का, यदि कोई मनुष्य उस नदी में स्नान न कर पाने में सक्षम में हो तो इस बर्तन में रखे जल के छीटे मारने मात्र से नदी में नाहये जितना ही शुद्ध माना जाता है।

भाव ये है यदि तुम मेरे अंशो की पूजा आराधना स्तुति करते हो, सत्य, अहिंसा व प्रेम के मार्ग पर चलते हो तो निश्चित ही मेरे अंशो में तुम्हे स्थान प्राप्त होगा और वो मुझसे निकले हैं जिसके कारण तुम मुझ तक पहुचते हो और मोक्ष रूपी अनन्त जीवन पाते हो। यद्धपि मनुष्य भ्रम की स्थिती पैदा करते है कहते हैं वो परमेश्वर है वो भगवान है, उसकी पूजा करो उसकी नही, वो शैतान के करीब ले जाता है, वो नही जानते कि मेरेकिसी भी रूप की स्तुति तुम्हे शैतान के करीब नह ले जाती अपितु तुम्हारे बुरे कर्म, कटु वचन, कपटी और स्वार्थी व्यवहार, व्याभिचार, धोखा देने की प्रवत्ति, किसी की हत्या करना, मास का सेवन करना, नशे में डूबे रहना, किसी के धनो को धोखे से हड़प लेना जैसे बुरे कर्म तुम्हे शैतान कि और ले जाते हैं।

हे मनुष्यों जैसे तुम्हारे किसी प्रियजन की मूर्ति अथवा तश्वीर तुम उसके जाने के बाद बनवा कर अपने घर व बहुत से व्यक्ति अपने क्षेत्र आदि में लगवा देते हैं, उन्हें आस्था व वशेष सम्मान होता है दिलमे अपने उन प्रियजन के लिए तथा वो चाहते हैं उनके प्रियजन के पथ पर चल सके व उनके अच्छे कर्मों के विषय मे हमेशा नई  पीढ़ी को पता हो और वो गलत मार्ग पर चलने से बचे। हे मनुष्यों जो मूरती पूजा के विरोधी है वो बताये यदि वो या उनके समुदाय के लोग ऐसा करते हैं तो क्या वो अथवा उनके समुदाय के लोग शैतान के उपासक है साथ ही वो अपने पूर्वजों से अलग है जिनकी मूर्ति व तश्वीर को अपने घर व क्षेत्र में लगवाते है, उनके परिवार का इतिहास अलग हो गया ऐसा करने से। 

यहाँ यद्धपिमेरे अंशो ने विभिन्न स्थानों पर मूर्ति पूजा का वरोध कर एक ही ईश्वर की उपासना करने को कहा है किंतु सत्य जाने बिना किसी भी मूर्ति पूजक को हेय दृष्टि से न देखे, क्योंकी उस मूर्ति जो कभी साकार रूप था, जिसके जाने के बाद उसकी याद में उसके मानने वालों ने मूर्ति निर्माण कराया ताकि सदा उनकी आस्था कायम रहे, उस मूर्ति स्वरूपकि आत्मा को देखो जो सदियों से एक है और रहेगी क्योंकी वो मेरा ही एक अंश था जिसको मैंने देश, काल, परिस्थिति के  अनुरूप भेजा था, हे मनुष्यो यदि तुम मेरी बात नही मानते व मेरे ही अंशो की अवहेलना करते हो मेरे क्रोध के भागी बनते हो। इसलिये किसी को कम न आको, सबकी आस्था को सम्मान दो”।

कल्याण हो

Sunday, 8 April 2018

ईश्वर वाणी-मूर्ति पूजा, 243

ईश्वर कहते हैं, “हे मनुष्यों यद्दपि में किसी भी विधि से की गई पूजा आराधना का विरोध नही करता किंतु देश काल परिस्थिति के अनुरूप मेरे ही अंश ने धरती पर आ कर मूर्ति पूजा का विरोध कर एकेशरवाद की नींव रखी। किंतु उन्होंने ऐसा क्यों किया, कारण क्या था जो उन्हें ऐसा कहने पर विवश होना पड़ा, क्यों उन्होंने पुराना सब भुला कर केवल अब जो उनको बताया गया केवल उसी पर विश्वास कर चलने को क्यों कहा गया।
कुछ मनुष्य सत्य जाने बिना केवल मूर्ति पूजकों का उपहास कर अपने धर्म को श्रेष्ठ बता अन्य को नीच कहते हैं, शैतान के अधीन कहते है जबकि वो खुद अज्ञानी है,अज्ञानता के कारण मानव का मानव से बैर रखते हैं, मेरी स्तुति करने वालो को नीचा कहते है जबकि सत्य से खुद भी अनजान होते हैं।
हे मनुष्यों ये सत्य है कि मेरे अंशो ने मूर्ति पूजा का विरोध किया क्योंकि प्राचीन काल में प्रत्येक राजा केवल अपने ही देवी देवता को श्रेष्ठ मानता था, युद्ध मे यदि कोई राजा जीत जाए तो हारे गए राज्य के राजा के कुलदेवता के मंदिर भी गिरा देता था ये उसका ये दर्शाना होता था कि वो कितना वीर है, इस प्रकार वो हारे गए राज्य के लोगो को भी पुराने देवी देवता की उपासना पर रोक लगा कर केवल उसी के बताये देवी देवता के पूजन पर बल देता और जो उसकी नही सुनता तो कठोर दंड मिलता। साथ ही प्राचीन धार्मिक ग्रंथ भी जीते हुए राजा द्वारा हारे हुए राजा के राज्य के नष्ट कर दिए जाते, जिससे लोगो में धीरे धीरे आक्रोश बढ़ने लगा, संसार मे अब एक ऐसे राज्य और लोंगो की कल्पना की जाने लगी जिसकी सभी एक समान भाव से पूजा करें, कोई किसी के धार्मिक स्थान को नुकसान न पहुचाये।
इसी बात को जन जन तक पहुचाने हेतु मेरे ही अंश में एकेशरवाद की नींव रख लोगो को एक करने का प्रयास किया। किंतु उनका कहने का अभिप्राय ये था यद्धपि तुम किसी मूर्ति के सामने मेरी उपासना करो लेकिन उस मूर्ति के स्वरूप को सत्य न मान कर उस आत्मा पर विश्वास करो जो परम होने के कारण परमात्मा है, सभी आत्माओं का स्वामी है, जिसने इस मूर्ति रूप में भी कभी अवतार धारण कर मानव व धरती व प्राणी जाती की समय समय पर रक्षा की है, इसलिए इस मूर्ति की नही उस आत्मा की पूजा करो जो समय समय पर तुम्हारे लिए अवतरित होती आयी है और आएगी हालांकि उसका ये स्वरूप नही होगा जो मूर्ति के रूप में तुम्हारे समक्ष हैं।
हे मनुष्यों मेरे अंशो द्वारा बताई बातो को लोगो ने तोड़ मरोड़ कर दुनिया के सामने ऐसे लाये जैसे मूर्ती पूजक शत्रु हो उनके जो मूर्ति पूजा में यकी नही रखते। साथ ही मेरे अंशो ने धार्मिक स्थान पर बाज़ारवाद पर भी रोक लगाने बलि प्रथा पर रोक लगाने पर जोर दिया, धार्मिक स्थानों पर फल फूल मिष्ठान सुगंध, बलि के लिए जानवर आदि को लाने पर रोक लगाई।
क्योंकि मैं परमेश्वर इनसे खुश नही होता, मेरे धार्मिक स्थान पर इसकी आवश्यकता नही और न ही बाज़ारवाद की, बस केवल मुझ पर विश्वास और मेरे बताये मार्ग का अनुशरण करो, प्राणी जगत का कल्याण करो,इनसे मेरी कृपा प्राप्त होगी।
किन्तु जो व्यक्ति मूर्ति पूजको का विरोध कर सोचते हैं कि वो सही है सत्य तो ये है सबसे गलत रास्ते पर वही है।
यद्धपि कोई दो बालक है, एक शिक्षक द्वारा बताने पर एक बार मे ही अपना पूरा पाठ समझ कर याद कर लेता है तो वही दूसरा बालक शिक्षक द्वारा समझाने पर भी किताब पढ़ कर लिख कर तथा कभी कभी किसी अन्य की सहायता ले कर पाठ याद कर पाता है, ऐसे में क्या वो शिक्षक गलत है जिसकी बात उस बालक को संमझ नही आई, या वो ही बालक सही है जिसने तुरन्त शिक्षक की बात समझ कर पूरा पाठ याद कर लिया।
यहाँ वो शिक्षक में हूँ, बालक तुम लोग हो, किताब वो धर्म व मत है
है जिसका तुम पालन करते हो, अब खुद बताओ कौन सा सही मार्ग है।“

कल्याण हो




Saturday, 31 March 2018

ईश्वर वाणी-वास्तविक प्रसन्नता 242

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों तुम दुःख क्यों

महसूस करते हो??क्योंकि तुम हर परिस्थिति को अपने अनुसार चाहते हो, किंतु जब परिस्तिथियां तुम्हारे अनुसार न चल कर अपने अनुसार चलती है तब तुम शोकित हो जाते हो।

हे मनुष्यों ये न भूलो जैसे घड़ी में समय पल पल बदलता रहता है, न कि सदा एक सा रहता है वैसे ही तुम्हारा समय एक सा नही रहता, पल पल बदलता रहता है पर हाँ तुम्हे ये पता नही चलता।

हे मनुष्यों जैसे घड़ी में समय रुक कर ठहर जाता है, वैसे ही जीवन की घड़ी में ये समय उस वक्त रुक जाता है जब तुम्हारी आत्मा तुम्हारी देह त्याग कर मुक्ति पा कर नए जीवन की लालसा में भटकती रहती है, यद्दपि अधिकतर आत्मा मुक्ति की अभिलाषी होती है किन्तु कुछ नही, क्योंकि वो खुद को इस रुके हुए समय मे ही सहज महसूस करती है हालांकि ऐसी आत्माये बुरे कर्म कर्म व बुरी सोच रखने वाली अधिक होती है।

हे मनुष्यों इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ काम क्रोध लोभ मोह अहंकार का त्याग कर मेरी शरण मे आओ, तुम सभी दुख से मुक्ति पाओगे, समय चाहे अनुकूल दिशा में चले या विपरीत तुम सदा सुख पाओगे।

सुख सच्चा न भौतिक रिश्तो में है न भौतिक वस्तुओं में, क्योंकि तुम्हारी लालसा कभी कम नही होती अपितु बढ़ती ही जाती है, तुम सदा इसे अपने अनुकूल चाहते हो किंतु जब अनुकूल नही होती ये चीज़े तो दुखी हो जाते हो।


यदि तुमने कोई इच्छा और मोह। ही नही रखा होता इन भौतिक रिश्तों व भौतिक वस्तुओं से तो दुख न पाते।


इसलिए यदि जीवन मे वास्तविक प्रसन्नता चाहिए तो मेरी शरण मे आओ, मेरे अतिरिक्त किसी की लालसा न करो निश्चित ही प्रसन्न होंगे।"

कल्याण हो