Friday, 13 July 2018

ईश्वर वाणी-263, प्रेत, भूत मोक्ष व अनन्त जीवन

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यद्धपि तुम्हे मैं अनेक जन्म व योनियो के विषय मे बता चुका हूँ, किँतु आज तुम्हें मैं भूत व प्रेत योनि के विषय में बताता हूँ, आखिर देह त्यागने के बाद कौन सी आत्मा प्रेत योनि में प्रवेश करती है और कौन सी भूत योनि में और कौन सी आत्मा मोक्ष को पाती है।

हे मनुष्यों यद्धपि तुम्हारे जन्म के समय से पूर्व ही तुम्हारी मृत्यु तेय हो जाती है साथ ही ये निश्चित हो जाता है कि तुम्हे इस जन्म के बाद मोक्ष मिलेगा या प्रेत या भूत योनि में रह कर समय व्यतीत करना होगा।

जिस व्यक्ति की मृत्यु अचानक किसी हादसे में हो जाती है, या कोई व्यक्ति किसी कारण आत्म हत्या कर लेता है, यदि किसी की अचानक हत्या कर दी जाती है,  ऐसे व्यक्ति खुद को सांसारिक बंधनो में बंधा ही समझते हैं, और वही ध्यान और आकर्षण अपने प्रियजनों से चाहते हैं जैसे जब वो जीवित थे, दूसरे शब्दों में ऐसी आत्माये अपने को मृत नही समझ पाते अपनी मृत्यु को स्वीकार नही कर पाती, ऐसी ही आत्माये प्रेत कहलाती है, ये वो अवस्था है जिसमे जीवन और मृत्यु के बीच सूक्ष्म देह फसी रहती है, और खुद को भौतिक देह के समान ही महत्व प्रदान करवाना चाहती है, और यदि इन आत्माओं की इच्छा पूर्ण नही होती या थोड़ी भी ये नाराज़ होती है तब अपने ही परिवार को हानि पहुंचाने में भी समय नही लगती, तभी इनकी शांति की प्रार्थना व पूजा अनिवार्य होती है अन्यथा ये कई युगों तक यूँही भटकती रहती हैं।

वही भूत ये वो अवस्था होती है जब प्राणी को ये पता होता है कि उसकी मृत्यु हो चुकी है, उसे अब भौतिक रिश्तों और भौतिक वस्तुओं से कोई मतलब नही, वो एकांत में रह कर केवल अपनी मुक्ति की कामना करती है, औरजब निश्चित समय आता है उसे मुक्ति मिल जाती है और आत्मा नए जीवन मे प्रवेश करती है, आमतौर ये आत्माये शांत होती है और मुक्ति की अभिलाषी होती है।

वही मोक्ष प्राप्त आत्मा देह त्यागने के बाद बहुत जल्दी ही दूसरा जन्म ले लेती है, इससे उन्हें प्रेत व भूत योनि में नही भटकना पड़ता, ये सब उसके कर्म पर निर्भर होता है, औरकर्म इसके जन्म के पूर्व ही निश्चित हो जाते हैं।

हे मनुष्यों यद्धपि तुम्हारे लिये ये निम्न रूप व योनियां हो किंतु मेरे लिए तुम सब एक आत्मा हो, जो मुझसे ही निकल कर मुझमे ही जब समा जाती है तब अनन्त जीवन और मोक्ष को प्राप्त होति है और मैं ईश्वर हूँ।"

कल्याण हो

Tuesday, 10 July 2018

ईश्वर वाणी-262, देह, आत्मा और कर्म प्रधान भौतिक जीवन






ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यू तो तुमने अपने जन्म कुंडली कई बार देखी होगी व कई ज्योतिष व जानकारों को दिखाई होगी, किंतु तुम्हे आज बताता हूँ इसके विषय में जिसे तुम्हे तुम्हारे ज्योतिष व जानकर ने भी नही बताया होगा।

यद्धपि जन्मपत्री में तुम अपने भविष्य व भूतकाल की जानकारी प्राप्त करते हो अथवा कर सकते हो, किंतु आज तुम्हें बताता हूँ तुम्हारे जन्म के समय से पूर्व ही तुम्हारे विषय में तुम्हारी भौतिक देह, आत्मा व कर्म के विषय मे पहले ही लिखा जा चुका होता है।

जब एक बालक माता के गर्भ में आता है तभी उसकी भौतिक देह का विकास होने के साथ ही कितनी आयु इस भौतिक देह की है ये लिखा जा चुका होता है।

इसके बाद उसमें जब आत्मा का प्रवेश हो कर जीवन आता है तब ये निश्चित होता है कि कितनी देर तक अर्थात कितने समय तक आत्मा इस भौतिक देह में रहेगी।

इसके बाद जब शिशु का जन्म होता है तब ये निश्चित होता है इसके कर्म कब तक रहेंगे अर्थात कब तक ये कर्म करता रहेगा इस भौतिक शरीर और आत्मा के साथ।

हे मनुष्यों यद्धपि इन तीनो की पूर्ण जानकारी के बिना जन्मपत्री में दी गयी जानकारी अपूर्ण है, किंतु ये जानना भी बहुत मुश्किल है कि एक शिशु कब अपनी माँ के गर्भ में आया, कब उसके शरीर मे आत्मा का प्रवेश हो जीवन प्रक्रिया की शुरुआत हुई साथ ही आत्मा और भौतिक शरीर के साथ शिशु का जन्म कब होगा।

किन्तु सारांश में जन्मपत्री केवल इस कर्म प्रधान समय और देह का ही आंकलन करते हुए भविष्यवाणी करता है किंतु ये भी सत्य है कि ये एक अधूरी जानकारी है।

हे मनुष्यों क्या तुमने कभी देखा है किसी प्राणी की आत्मा उसके भौतिक शरीर को के नष्ट होने के बाद छोड़ कर गयी है, नही ऐसा संभव ही नही, पहले आत्मा देह त्यागती है उसके बाद ही देह नष्ट होती है।

कभी कभी इंसान भौतिक शरीर व आत्मा दोनों के साथ तो होता है लेकिन कर्म करने की दशा में नही होता(जैसे कोई कोमा में होता है) किन्तु फिर एक निश्चित समय बाद उसकी आत्मा भौतिक देह को छोड़ जाती है और भौतिक देह भी अपने समय के बाद नष्ट हो जाती है अथवा कर दी जाती है।

भाव यही है भौतिक शरीर,आत्मा और कर्म प्रधान देह इन तीनो का ही ज्ञान अतिआवश्यक है, और जब तक इन तीनों की जानकारी नही होती अथवा कोई जानकर जब तक इनकी पूर्ण जानकारी नही देता तब तक जन्मपत्री की जानकारी पूर्ण नही अपितु अपूर्ण ही होगी।

कल्याण हो

Wednesday, 4 July 2018

ईश्वर वाणी-261, भूकम्प की असली वजह👌👌👍👍






ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यू तो तुम्हें अनेक विषयों का ज्ञान दे चुका हूँ, ब्रह्माण्ड व अनेक ग्रह नक्षत्रों के विषय में बता चुका हूँ किंतु आज तुम्हें पृथ्वी के रहस्य के विषय में बताता हूँ।

अक्सर तुमने भूकम्प के आने के विषय मे सुना होगा, भूकम्प के झटके भी तुमने महसूस किए होंगे, अनेक वैज्ञानिक तथ्य भी तुमने सुने होंगे, किन्तु अब तक जो तुमने सुना और जाना वैज्ञानिक आधार पर वो पूर्ण सत्य नही है, पूर्ण सत्य क्या है आज तुम्हे मै बताता हूँ।

"एक मिट्टी का चूल्हा है जिस पर निरंतर आग जल रही है अभी आग कुछ धीमी है, उस पर पानी से भरा एक भगोना (पतीला) रखा गया जिसके तले में 7,8 तस्तरी  रख दी गयी, और उस पतीले को एक तस्तरी से ढक दिया गया साथ ही उस तस्तरी पर कुछ चने के दाने बिखेर दिए गए, कुछ समय बाद उस भगोने में भाप बनने के कारण वो तस्तरी हिलने लगती है, चुकी अभी आग कुछ धीमी है इसलिए भाप अधिक नही बन रही, किंतु जैसे ही इस आग पर लकड़ी या कोयला डाला गया  जो भगोने को सहायता देने के लिए  चूल्हे पर ही रखा गया था आग और तेज़ हो गयी जिससे पतीले में भाप तेज़ी से बनने लगी बल्कि पतीला भी हिल गया, जिससे उसके ऊपर रखी तस्तरी पूरी तरह हिलने लगी, और इस कारण इस तस्तरी पर रखे चने के दाने भी हिलने लगे और इधर उधर बिखरने लगे, जिस स्थान पर इन्हें रखा वो स्थान ये छोड़ अलग भागने लगे।

हे मनुष्यों यही प्रक्रिया भूकम्प के समय पृथ्वी की है, वो जलता हुआ चूल्हा धरती का वो गर्म भाग है जो सूर्य जैसी ही तपन रखता है, भगोने का वो तला धरती का वो भाग है जो इस आग उगलती धरती से ऊपर का है, इसके बाद पानी वो हिस्सा है जो इस धरती की गर्मी को ऊपर नही आने देता, लेकिन  जब धरती की सतह की दीवारे उसकी गर्मी के कारण टूट कर गिरती है उसके गर्म भाग पर तब ये वो चूल्हा बन जाती है जिस पर कोयला आदि ईंधन गिर कर  इस आग को भड़काता हो साथ ही उस पतीले में रखी निम्न तस्तरिया ही धरती की अनेक परते है जो कि उसके गर्म भाग और ऊपर के शांत और ठंडे भाग बीच में भी है, जब आग तेज़ होती है तब ये उस भगोने में रखे पानी की तरह ही क्रिया करती है, चुकी धरती की गहराई में अति गर्म वातावरण से उसकी सतह कोयला बन कर इस गर्म स्थान पर गिरी जिससे आग भड़की और साथ ही तेज़ी से भाप बन उस भगोने की तस्तरी की तरह धरती का ऊपरी भाग हिलने लगा और लोग जिसे भूकम्प कहते है, किंतु यह तुम्हें एक और बात बताता हूँ चूँकि धरती के नीचे थोड़ी थोड़ी मात्रा में ये भूस्खलन होता है जो इस सतह को निरंतर गर्म रखता है, और ये गर्मी धरती के जीवित रहने के लिए अनिवार्य है, यदि धरती जीवित नही तो कोई भी जीवित नही बचेगा, साथ ही जब एक बड़ा भाग टूट कर इस धरती रूपी भट्टी में गिरता है तब धरती के उस गर्म भाग से लेकर उस ठंडे भाग तक धरती कही नीची तो कही ऊपर हो जाती है किंतु इस बीच धरती की वो तस्तरी जिस पर सभी प्राणी रहते हैं वो हिलती है, धरती का वो हिस्सा धरती की एक तस्तरी है जो जीवन के योग्य है।

हे मनुष्यों यद्धपि भूकम्प से इस प्रकार की प्रक्रिया से धरती पर अनेक गढ्ढे हो जाते, इस प्रक्रिया को संतुलित रखने के लिए मैंने ज्वालामुखी का निर्माण किया, जिसके विस्फोट से लावा व राख निकलती है, जिससे धरती पर भूकम्प के कारण हर स्थान पर गढ्ढे नही पड़ते,साथ ही कई ज्वालामुखी तो धरती की उस गहराई में ही फटते है जहाँ से इनका लावा और राख धरती की इस तस्तरी रूपी सतह पर नही आते किंतु ये प्रक्रिया होती रहती है जो धरती का नियंत्रण बनाये रखने के साथ इसे जीवित रखती है।"

कल्याण हो


Sunday, 1 July 2018

ईश्वर वाणी-260, मनुष्य जाति की प्रजाति



ईश्वर कहते हैं, “हे मनुष्यों यूँ तो मैंने अनेक विषयों की तुम्हें जान कारी दी है, किंतु तुम्हे आज मानव जाति की उत्तपत्ति के विषय में बताता हूँ जो हर मनुष्य को पता होनी ही चाहिए, जैसे कि तुमने ये सुना है मनुष्य का जन्म बंदर जैसी ही किसी प्रजाति के परिवर्तन से हुआ है, किंतु आज तुम्हे बताता हूँ ये एक अर्धसत्य है, पूर्ण सत्य तुम्हे आज बताता हूँ।

हे मनुष्यों जैसे शेर की प्रजाति के -चीता, तेंदुआ, बाघ बिल्ली, कुत्ता, लोमड़ी, गीदड़, भेड़िया आदि जानवर आते है, मगरमच्छ जाती में-छिपकली, विषखोपड़ा, आदि प्रजाति आती है,  गाये की जाती में-भैंस, बकरी, हिरण, ऊँट, खरगोश, गिलहरी, गेंडा,  बारहसिंगा,ज़ेबरा आदि जानवर आते हैं, उसी तरह साँप की प्रजाति में अनेक रेंगने वाले जीव आते हैं।

ठीक वैसे ही इंसान इन जानवरों (बन्दर) से  परिवर्तित प्रजाति नही अपितु इन्ही में से ही एक अतिबुद्धिमान पशु है, किंतु आज इंसान खुद को जानवर कहने से कतराता है किंतु कार्य उसके जानवरो से भी नीच करता है।

हे मनुष्यों इस प्रकार मनुष्य  जाति सिर्फ एक परिवर्तित जाती नही अपितु बंदर प्रजाति मेसे ही एक है तभी पुराने समय में बन्दर भी निम्न राज्यो के राजा हुआ करते थे, मनुष्य और वानरों  के सम्बंध तुम्हे रामायण में मिल जाएंगे, साथ ही ये सत्य तुम्हे अब ज्ञात हो चुका है मनुष्य भी इन्ही की प्रजाति का ही एक जीव है।“

कल्याण हो

Thursday, 28 June 2018

ईश्वर वाणी-259, अभोतिक्ता की प्राप्ति👍👍




ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यद्धपि तुम्हे मैं अनेक ज्ञान विभिन्न
विषयों पर दे चुका हूँ, किंतु तुम्हें आज बताता हूँ कैसे ब्रह्मांड के
समस्त ग्रह, नक्षत्र, उल्का, काले गड़हे(black whole), समस्त आकाशीय पत्थर
के विषय में।
हे मनुष्यों क्या तुमने कभी सोचा है कि आकाश में सभी ग्रह केवल गोल आकार
में ही घूमते हैं, यद्धपि तुम्हे बता चुका हूँ कि एक दूसरे के
गुरुत्वाकर्षण बल व अपने गुरुत्वाकर्षण बल के कारण समस्त ग्रह नक्षत्र
गोल गोल घूमते। हुए भी एक दूसरे से निश्चित दूरी बनाते हुए घूमते हैं और
एक दूसरे से नही टकराते।

किंतु क्या तुमने कभी विचार किया है ये सभी आकाशीय घटना सदैव गोल गोल ही क्यों होती हैं, समस्त ग्रह नक्षत्र गोल ही क्यों घूमते हैं, ब्लैक होल भी गोल आकार में ही फैलता है, समस्त आकाशीय उल्काये व पत्थर भी गोल आकार में घूमते हुए ही विचरण करते हैं।


ऐसा इसलिए कि समस्त ब्रह्माण्ड का आकार ही अंडाकार उस शून्य के समान है, इसमें उपलब्ध दिव्य जल के इस प्रकार घूमने से ही समस्त ब्रह्माण्ड ही इस प्रकार घूमता है जो ये बताता है श्रष्टि की उत्पत्ति इसी शून्य से हुई थी साथ ब्लैक होल ये बताते हैं इसी शून्य में तुम्हें मिल जाना है जिससे तुम उतपन्न हुए थे।

साथ ही ये बिल्कुल उस धरती की प्रक्रिया के समान है जैसे किसी बड़े से बर्तन में पानी भर कर उसमें कुछ चीज़ें जो डूब न सकती हो डाल कर उस जल को गोल गोल तेज़ी से घुमाया जाये, इस प्रकिया में वो चीज़े जो जल में डाली गई थी वो जिस प्रकार घूमेंगी साथ ही कुछ एक दूसरे से तक्रांयगी भी, यही प्रक्रिया इस आकाशीय दिव्य सागर की है, तभी कुछ उल्का पिंड व पत्थर आकाश में बहते हुए अनेक ग्रहो से टकरा जाते हैं।

हे मनुष्यों ये न भूलो उस दिव्य आकाशीय सागर को तुम इन भौतिक आंखों से नही देख सकते, जैसे आत्मा, वायु को तुम इन भौतिक आँखों से नही देख सकते, इन नेत्रों से तुम बस वही देख सकते हो जो भौतिक है और जो भौतिक है वो नाशवान है अर्थात एक माया अथवा एक छलावा है, इसलिए तुमसे कहता हूँ उस अभौतिक को देखो जानो महसूस करो जो परम् सत्य है और जिसे तुम केवल आध्यात्म के माध्यम से ही प्राप्त कर सकते हो,  जिस दिन तुमने भौतिकता को त्याग अभौतिक को प्राप्त कर लिया तुम्हे भी उस आकाशीय दिव्य सागर और उसमें किस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड समाया और कार्य करता है का ज्ञान हो जाएगा।"👍


कल्याण हो

Sunday, 17 June 2018

ईश्वर वाणी-258, अनन्त जीवन, मोक्ष,

 ईश्वर कहते है, "हे मनुष्यों यद्धपि तुमने स्वर्ग और नर्क की कई बातें सुनी होंगी, मोक्ष और अनन्त जीवन की बाते सुनी होंगी किंतु आज तुम्हे बताता हूँ यद्धपि पहले भी तुम्हे बता चुका हूँ आज फिर तुमसे कहता हूँ तुम्हारे कर्म के अनुसार मिलने वाला सुख और दुख ही वास्तविक स्वर्ग और नरक है।

व्यक्ति जो भी कार्य करता है जैसे कर्म व व्यवहार व आचरण करता है वैसा ही जन्म उसे अगला मिलता है, उदाहरण-यदि कोई व्यक्ति अपने शक्ति धन जन आदि के अभिमान में किसी निरीह, बेबस को सताता है, दूसरो की निंदा करता है,
आलोचना व तिरस्कार करता है तो निश्चित ही भले वो इस जीवन मे अपने पिछले जन्म के फलस्वरूप सुखो को प्राप्त करे किंतु अपने अगले जन्म के सुखों में कमी कर खुद ही अपने द्वारा नरक के दरवाजे खोलता है, वही दूसरी और अनेक कष्ट झेलने के बाद भी जो मनुष्य धैर्य पूर्वक सत्कर्म करता है वो अपने लिए स्वर्ग में स्थान सुनिश्चित करता है।

साथ ही जो व्यक्ति सत्कर्म करता है, मेरे बताये नियम पर चलता है, मेरे द्वारा ली गयी अनेक परीक्षा को भी सफलता पूर्वक उतीर्ण करता है, उसे मोक्ष रूपी अनन्त जीवन की प्राप्ति होती है।

हे मनुष्यों प्रत्येक जीव आत्मा के लिए ये भौतिक देह एक कैद के समान है, प्रत्येक जीव आत्मा इस कैद से आज़ाद होना चाहती है, मुक्ति पाना चाहती है, किंतु उसके कर्म ही निश्चित करते हैं उसे मुक्ति मिलेगी या नही, यद्धपि किसी की मृत्यु को मोक्ष कहना अनुचित है क्योंकि मृत्यु उस भैतिक देह की होती है जिसमे वो आत्मा कैद थी, किँतु इस कैदखाने के बाद उसे दूसरा कैदखाना मिलता है, और ये चक्र चलता रहता है जब तक आत्मा को मोक्ष रूपी अनन्त जीवन नही मिल जाता, और तब तक आत्मा अपनी मुक्ति के लिए तड़पती रहती है किंतु जीव खुद अपने स्वार्थ में इतना खोया रहता है कि आत्मा की तड़प उसे नही सुनाई देती और अपने स्वार्थ की पूर्ति मैं अपने अनेक जीवन व्यर्थ कर देता है।

हे मनुष्यों यु तो मैं एक अनन्त सागर हूँ, और तुम सब मुझ सागर से निकली एक बूँद हो, तुम्हारे भौतिक रूप उस मिट्टी के बर्तन के समान है जिसमे जल रूपी बूँद को रखा जाता है, और आत्मा का वही रूप तुम देखते हो जो जल रखे बर्तन में जल का होता है, किंतु जब जल को उस बर्तन से निकाल कर वापस सागर में डाल दिया जाता है फिर उस जल का कोई रूप न हो कर वो एक विशाल सागर बन जाता है, यद्धपि कुछ समय पश्चात बदल भाप बना फिर उसे ले जायँगे व वो फिर बूँद बन कर किसी न किसी स्थान पर गिरेगा व वही रूप उसका होगा। ठीक वैसे ही मोक्ष प्राप्त जीव आत्मा है जो मुझ विशाल सागर में अवश्य मिल जाती है किंतु फिर से नया किंतु श्रेष्ट जीवन को पाती है।

किंतु स्वर्ग धारण की आत्मा शीघ्र ही जन्म लेती है और अनेक भौतिक सुख पाती हैं वही नरक प्राप्त आत्माएं जीवन भर हर तरह कष्ट प्राप्त करती है।

हे मनुष्यों ये मत भूलो स्वर्ग और नर्क कहि और नही यही धरती पर है और तुम खुद अपने कर्मो के माध्यम से वहाँ पहुँचने का मार्ग बनाते हो, किंतु तुम मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बनाओ, क्योंकि ये मत भूलो आत्मा को भी जन्म मरण के कार्य कुछ समय का अवकाश चाहिए होता है जिसे मोक्ष कहते हैं किंतु मनुष्य स्वार्थ में डूबे होने कारण आत्मा की वो इच्छा नही समझता और सिर्फ भौतिक संसाधन एकत्रित करने में लगा रहता है और खुद की ही आत्मा को कष्ट पहुचाता रहता है। मनुष्य नही जानता कि ये आत्मा कितने ही जन्म ले चुकी है, अब इसे भी अवकाश चाहिए, ये भी थक चुकी है, यद्धपि अनेक रूपो में इसने जन्म लिया है किंतु जन्म मरण के चक्र में कई वर्षों से फसी आत्मा अब मोक्ष चाहती है, मुक्ति चाहती है, जिसे केवल तुम दे सकते हो।

हे मनुष्यों इसलिए नेक कर्म करो, मेरे बताये मार्ग पर चलो ताकि तुम मोक्ष रूपी अनन्त जीवन पा सको।

कल्याण हो

Saturday, 16 June 2018

ईश्वर वाणी-257, ईश्वर के निम्न रूपों पर श्रद्धा



ईश्वर कहते हैं, “हे मनुष्यों यद्धपि में एक निराकार आदि व अनन्त ईश्वर हूँ, यद्धपि मैं ही  अपने अंश को देश काल परिस्थिति के अनुरूप धरती पर भेजता हूँ अपने समान ही समस्त अधिकार दे कर,  जिन्हें तुम निम्न नाम व रूपों में मानते व पूजते हो किन्तु आज तुम्हें बताता हूँ यद्धपि बहुत से मनुष्य मेरे जिस रूप को पूजते हैं उसे ही श्रेष्ठ समझ मेरे अन्य रूपों की आलोचना करते है, ऐसा करके वे केवल अपनी अज्ञानता व मूर्खता का ही परिचय देते हैं।
किंतु कई ज्ञानी व्यक्ति भी मेरे उसी रूप में मुझे देखना पसंद करते हैं जिसमें उनकी श्रद्धा है, कारण-जैसे तुम्हारा कोई प्रियजन जिस वस्त्र में अधिक सुंदर व आकर्षक तुम्हे लगता है, उसी रूप में तुम उसको देखना अधिक पसंद करोगे, ये जानते हुए भी की चाहे वो व्यक्ति कोई भी वस्त्र पहने रहेगा वही जो तुम्हारा अपना है किंतु फिर भी तुम उसे उसी रूप में देखना पसंद करते हो जिसमें वो तुम्हे अच्छा लगता है, वैसे ही ज्ञानी मनुष्य भले जानता है आत्माओ में प्रथम आत्मा परमात्मा में ही हूँ किंतु व्यक्ति मुझे उसी रूप में देखना अधिक पसंद करता है जिसमे उसकी असीम आस्था होती है।

हे मनुष्यों जैसे एक मिट्टी से कुम्हार अनेक बर्तन बना देता है, उन बर्तनों की गुडवत्ता उसी मिट्टी की गुडवत्ता पर निर्भर करती है जिससे उन बर्तनों का निर्माण हुआ था, और बर्तन टूटने के बाद वो बर्तन फिर उस मिट्टी में जाते हैं जिससे उन बर्तनों का निर्माण हुआ था, फिर पुनः कुम्हार उस मिट्टी से बर्तन बनाता है। भाव ये है मैं वो मिट्टी हूँ जिससे मेरे अंशो का निर्माण मेरे ही कुम्भार रूपी अंश द्वारा होता है, इसी प्रकार वो मेरे समान ही सम्मानीय और श्रेष्ठ है क्योंकि जैसे मिट्टी बर्तन का रूप धारण करने उपरांत भी मिट्टी होती है वैसे मेरे द्वारा संसार की भलाई हेतु जन्मे मेरे अंश मुझसे निकल कर परमेश्वर का ही रूप होते हैं, यद्धपि किस आत्मा को मोक्ष देना  है किसे नही देना वही तय करते हैं और मोक्ष वाली आत्मा को मुझ परमात्मा रूपी मिट्टी में मिला अनन्त जीवन देते हैं।“

कल्याण हो