Tuesday, 30 April 2013

डर लगता है -kavita











डर लगता है अब नज़ारे मिलाने में, डर लगता है अब बाहर जाने में, क्या बता मिल जाए मुझे भी कबि कही कोई हवस का पुजारी 
डर लगता है अब रिश्ते बनाने में, डर लगता है अब रिश्ते निभाने में, क्या पता कब कौन बन जाए मेरी अस्मत का सौदागरी, 
डर लगता है अब अपनों से दर लगता है अब सपनो से, डर लगता है अब हर रिश्ते नातों से, क्या पता कब बन जाए कोई अपना ही मेरी लाज  का लुटेरा  और जिस्म का अभिलाषी,
डर लगता है अब हर करीब आने वाले से, डर  लगता है अब हर मुस्कुराने वाले से, जाने कब बन जाए उसकी आखे मेरे जिस्म की प्यासी,
डर लगता है अब जीवन की हर उमंग से, डर लगता है अब नयी  हर तरंग से, था कभी  इंतज़ार ज़िन्दगी के किसी मोड़ पे किसी का साथ पाने का, था बस एक ख्वाब उनके साथ हर पल जीने का, 
थी बस इतनी से तमन्ना ज़िन्दगी उनकी बाहों में बिताने की, चाहत थी इतनी सी की कभी तो कही मिलेगा जो होगा सिर्फ मेरा, साथ उसका पा कर ख़ुशी रहने की बस ये ही हसरत मैंने बस की थी,
सोचता था मन ये मेरा मिलेगा कही तो मुझे वो जिसका दिल होगा सबसे  सच्चा होगा जो इस जग में सबसे अच्छा,
दुनिया की हर बुराई  से कोशों वो दूर होगा, किसी और के नहीं बस मेरे ही वो करीब होगा, रहे चाहे दुनिया में कही भी वो पर उसके दिल में सिर्फ प्यार तो मेरे लिए ही होगा,
पर जैसे जैसे मुझे आने लगी है समझ, दिखने लगे है इस दुनिया के रंग और नज़र आने लगे है लोग मुझे बेरंग,
आज वक़्त और हालत को समझ कर लगता है डर की न मिल जाए मुझे भी कही मोहब्बत के नाम पे लुटेरा कोई, 
डर लगता है न मिल जाए मोहब्बत के नाम पे हवस  का देवता  कोई, क्या पता मुझे भी मिल जाए आशिक के नाम पे कोई व्याभिचारी, डर लगता है अब उस रिश्ते से भी जिसका इंतज़ार था मुझे कभी कही मिलने का, था एक सपना संग उसके एक छोटा सा आशियाना बसाने का,
पर अब डर लगता है न मिल जाए मुझे अब कोई दुराचारी,  डर लगता है उसी से न मेरी शादी हो जो हो किसी का  बलात्कारी ,
डर लगता है अब हर शख्स से, डर लगता है अब हर साए से, डर  लगता है अब खुद से, न बन जाऊ मैं  किसी का  शिकार कही, न मिल जाए ज़िन्दगी में मुझे  जिस्म के भूखे  और  हवस के पुजारी ये बलात्कारी।।




करते हैं तुमसे कितना प्यार

“Karte hain tumse kitna pyaar ye tumhe hum bata nahi sakte, rah nahi sakte bin tumhare ye bhi tumhe hum jataa nahi sakte, bade bebas hain hum tumhare ho bhi nahi sakte aur tumhe paa bhi nahi sakte”


" करते हैं तुमसे कितना प्यार ये तुम्हे हम बता नहीं सकते, रह नहीं सकते बिन तुम्हारे ये भी तुम्हे हम जता नहीं सकते, बाद बेबस हैं हम तुम्हारे हो भी नहीं सकते और तुम्हे पा भी नहीं सकते "

ईश्वर वाणी -34, ishwar Vaan-34

नमस्कार दोस्तों आज फिर हम हाज़िर है ईश्वर वाणी में आपसे ईश्वर द्वारा बताई गयी बातों को आपसे शेयर करने यानि की बाटने, दोस्तों हमने कुछ सवाल प्रभु से करे जो हमारे मन में उठे थे और उन सवालों का जवाब प्रभु ने बड़े ही सहज और आसन शब्दों में हमे दिया,  आप अब सोच रहे होगे की आखिर हमने क्या सवाल प्रभु से करे और उनका क्या जवाब उन्होंने हमे दिया, चलिए हम और इंतज़ार आपको नहीं करवाते और बताते हैं की क्या सवाल हमने उनसे करे और क्या उन्होंने हमे उनका जवाब दिय। 


प्रश्न-१ ?  हमने प्रभु से पूछा की भगवंत पाप और गलती करने में क्या अंतर है??

प्रश्न- २? हमने प्रभु से पूछा की भगवंत पाप और गलती करने वाला मनुष्य क्या छमा का पात्र होता है या फिर नहीं या फिर गलती करने वाला होता है और पाप करने वाला नहीं या फिर पाप करने वाला छमा के काबिल  होता है और गलती करने वाला नहीं, प्रभु कृपया मार्गदर्शन करे?


उत्तर-१* 
                                                      पाप   
प्रभु बोले " जो कार्य अपने स्वार्थवश किया जाता है तथा जिसमे केवल खुद को ही फायदा होता है किन्तु दुसरे किसी निर्दोष प्राणी को तकलीफ होती है, लेकिन  ऐसा कार्य करने वाला जानता है की उसके कार्य से किसी निर्दोष को तकलीफ होगी किन्तु फिर भी वो अपने स्वार्थ के वश में और केवल खुद के फायदे के लिए और खुद की ख़ुशी के लिए  ऐसे कार्य करता है तो ऐसे कार्य पाप की श्रेणी में आते हैं, प्रभु कहते हैं की पाप करने वाला जातना है की वो क्या कर रहा है और उसके इस कार्य से किसे नुक्सान और उसे फायदा हो रहा है किन्तु फिर भी वो ऐसा करता चला जाता है, ऐसे व्यक्ति के कार्य को पाप कहा जाता है जो सब कुछ जान करा और समझ कर करते है। "


                                                गलती 

प्रभु बोले " जो कार्य नादानी और अज्ञानतावश किया जाता है यधपि उसके कार्य से किसी को नुक्स्सान भले हुआ हुआ हो वो गलती की श्रेणी में आता है क्यों की ऐसा करने वाले को सही और गलत का अंदाजा ही नहीं था, यदि होता तो वो ऐसा कार्य कदापि नहीं करता जिससे किसी का अहित होता, गलती करने वाले व्यक्ति को जब भी अपनी गलती का अहसास होता है तो वो अपने कार्यों के लिए छमा याचना करता है अवं अपने कर्मों का प्रायश्चित करने को सदा तत्पर रहता है, 

प्रभु गलती करने वाले को एक अबोध बालक के सामान मानते हैं, वो कहते हैं जिस प्रकार एक अबोध बालक अज्ञानतावश खेल ही खेल में कोई कीमती वष्टु खो देता है अथवा तोड़ देता है फिर भी दंड का भागी नहीं बनता क्यों की उसने ऐसा अज्ञानतावश किया है, यदि वो जानता की उसने किया क्या है या कर क्या रहा है तो वो ऐसे नुक्सान वाले कार्य को करता ही नहि। "

इस प्रकार प्रभु ने हमे गलती और पाप में अंतर समझाया।



उत्तर- २*                                पाप 


    प्रभु कहते हैं की जो कार्य अपने स्वार्थ सिध्ही के लिए किये जाते हैं तथा जिनके करने से किसी निर्दोष प्राणी का अहित होता है ऐसे कार्यों को पाप कहते हैं जो कदापि छमा के काबिल नहीं होते, क्यों की ऐसे कार्य स्वार्थवशऔर केवल अपने हित के लिए किये जाते है और करने वाले को सही और गलत की पूर्ण समझ होती है फिर भी व्यक्ति अपने स्वार्थ की पूर्ती हेतु दुसरे निर्दोष प्राणी को नुक्सान पहुचाता है, ऐसे मनुष्य छमा के काबिल नहीं होते। 

प्रभु कहते है भले पापी व्यक्ति दंड से भयभीत हो कर छमा मांग ले, अपने पापों के प्रय्च्चित करने को भी तैयार हो जाए फिर भी उसे दंड मुक्त नहीं करना चाहिए क्यों की जब वो पाप कर रहा था तब भली प्रकार वो अपने कार्यों के लिए नियुक्त डंडों को भी वो जानता था किन्तु फिर भी वो ऐसे कार्य करता गया, इस प्रकार ऐसे मनुष्यों को छमा करना अनुचित होग। 

                                          गलती 

    प्रभु कहते हैं जो कार्य नासमझी में किये जाते हैं तथा जिनके करने करने का सही गलत का ज्ञान नहीं होता उन्हें गलती कहते हैं, ऐसे कार्य अज्ञानता के अभाव में किये जाते हैं तथा ऐसे कार्य करने वाले व्यक्ति छम के पात्र होते हैं, क्यों ऐसे व्यक्तियों को जब अपनी गलती और अपने कार्यों का ज्ञान होता है तब वो बिना विलम्ब करे अपने कार्यों के प्रायश्चित के लिए तैयार हो जाते हैं, तथा ऐसे मनुष्य को छमा  करना उचित होता है। 







Saturday, 20 April 2013

सत्य वचन

ये जरुरी नहीं की किसी को घायल और चोट पहुचाने के लिए किसी हथियार की जरुरत पड़े, शब्दों द्वारा भी किसी को चोटिल और घायल किया जा सकता है, किसी हथियार से घायल व्यक्ति तो जल्द ही उस चोट से उबर आता है किन्तु शब्दों से घायल व्यक्ति को  उबरने में काफी समय लगता है या फिर कभी कभी वो पूरी ज़िन्दगी ही नहीं उबर पाता , इसलिए कभी कोई ऐसी बात न करो किसी से जो किसीके  दिल को घायल करे और न ऐसे किसी शख्स से कोई रिश्ता रखो जिसके बाते तुम्हारे दिल को कभी न भरने वाला जख्म दे जाए !




आर्चु  वाणी 



ईश्वर वाणी-33 **Ishwar Vaani**-33**ईश्वर कहते हैं हमे अपने शरीर की सुन्दरता और स्वचाता की अपेक्षा अपनी आत्मा और अपने ह्रदय की सुन्दरता और स्वछता पर ध्यान देना चाहिए**



ईश्वर कहते हैं हमे अपने शरीर की सुन्दरता और स्वचाता की अपेक्षा अपनी आत्मा और अपने ह्रदय की सुन्दरता और स्वछता पर ध्यान देना चाहिए, प्रभु कहते हैं ये जो भोतिक है जो नाशवान है हमे इससे मोह नहीं रखना चाहिए, यदि मोह रखना है तो अपनी आत्मा का रखो क्यों की भविष्य में एक दिन एक भोतिक शरीर तुम्हारा साथ छोड़ देगा किन्तु तुम्हारी आत्मा है तुम्हारे कर्मों अनुसार उस परमेश्वर से तुम्हारा साक्षात्कार कराएगी, इसलिए हे मनुष्यों जितना समय तुम अपने शरीर को सुन्दर और स्वाच्या बनाने में लगा रहे हो उसका एक तिहाई भी अगर अपने ह्रदय और अपनी आत्मा की शुध्ही में लगाओ तो तुम्हे तुम्हारे पापो के लिए उस परमेश्वर द्वारा छमा मिल सकती है जिससे तुम्हारा ये मानव जीवन सार्थक हो सकता है और तुम्हे अनन्य मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है, इसलिए हे मनुष्यों अपने भोतिक शरीर का मोह त्याग और अपने झूठे अभिमान को त्याग और परमेश्वर के द्वारा बताये गए मार्ग पर चल, अगर मानव ने इश्वरिये मार्ग न अपनाया तो ईश्वर को भी अपना भयानक रूप दिखाना होगा, प्रभु कहते हैं अगर उन्होंने अपना विकराल रूप दिखा दिया तो वो दिन इस समस्त धरा का अंतिम समय होगा, प्रभु कहते हैं हे मनुष्यों तुम मुझे मजबूर मत करो की अपने द्वारा बनायीं गयी इस दुनिया को मैं खुद ही समय से पहले इससे नष्ट कर दू, इसलिए हे मनुष्यों सुधर जाओ क्यों की अभी भी समय है तुम्हारे पास सुधरने का पर आने वाले समय में तुम्हे ये अवसर भी प्राप्त न होगा और तुम्हारे पास केवल पछताने के अतिरक्त और कुछ न बचेगा ! 

 थैंक्स एंड ग्रेट रेगार्ड्स
                                                                                                    अर्चु 



ईश्वर -वाणी-३ २ **Ishwar Vaani**-32**जन्म-मरण **

नमस्कार दोस्तों हम फिर हाज़िर हैं अपनी प्रभु वाणी में प्रभु के वचनों के साथ, दोस्तों हमने कुछ सवाल प्रभु से करे और उन्होंने हमे उनका जवाब दिया बड़े ही सहज तरीके से, आप भी जानिये की हमने उनसे क्या पूछा और उनका जवाब क्या रह… 


हमने पूछा प्रभु दुनिया में कई जगह लोग कहते हैं की हमे ये जीवन केवल एक बार ही मिलता है किन्तु कई लोग कहते  हैं की जन्म-मरण का दौर तो हम कई युगों से देखते आ रहे हैं किन्तु हमे याद नहीं कुछ किन्तु हम इससे पहले भी थे आज भी हैं और आगे भी रहेंगे, क्या सच है प्रभु आप हमे बताये कृपया??

   
प्रभु बोले ये सच है की ये जन्म तुमने पहली बार नहीं लिया है, इससे पहले भी तुम इस दुनिया में कई बार आ चुके हो, प्रभु कहते हैं ८ ४ लाख योनियों के बाद ये मानव जीवन मिलता है ताकि मेरे द्वारा बताये गए मार्ग पर चल कर मोक्ष को प्राप्त करो किन्तु जो लोग भोग-विलाश में विलीन रहते हैं, भोतिक सुखों को ही परम सुख मानते हैं उन्हें मोक्ष नहीं मिलता, जो काम,क्रोध, लोभ, मोह  और  अहंकार के अधीन रहते हैं वो मुझे कभी नहीं  पा सकते, ऐसे लोग सदा जीवन और मृत्यु के चक्र में उलझे  रहते हैं किन्तु जो लोग अपने इस मानव जीवन में मेरी बताये गए मार्ग पर चलते हैं उन्हें फिर दुबारा इस मृत्यु लोक में आने की आवश्यकता ही नहीं है,


प्रभु कहते हैं की विभिन्न जगह पर मैंने विभिन्न रूपों में जन्म लिया और वह के लोग मुझे वह के नाम और रूप में जानते और पूजते हैं,  वहा  के लोगों की मान्यता है की ये ही जन्म आखिरी है और इसके बाद कोई और जन्म नहीं है, किन्तु सच तो ये है उन लोगों ने मेरी बातों को ठीक से नहीं समझा, प्रभु कहते हैं की ये जन्म तो केवल एक बार ही मिलता है जो मोक्ष को पाने का मार्ग है, और यदि तुमने इस जन्म अपने जन्म-जन्मान्तरों के पापों के लिए प्रभु से माफ़ी नहीं मांगी तो युगों युगों तक पछताओगे क्यों की फिर तुम इस मानव जन्म को नहीं प् सकोगे, ये जन्म तुम्हे तुम्हारे पापों के समस्त प्रायश्चि के लिए मिला है, इसलिए हे मानवो ईश्वर द्वारा बताये गए सत्मार्ग पर चलो और मोक्ष को प्राप्त हो !


  

Ishwar Vaani-31"a" **Naari ke vishaye mein**

namskaar doston hum aaj fir haajir hain apni Ishwar Vaani mein uss parmeshwer ke vachan/vaani aapse baantne ke liye, doston humne Ishwar se kuch sawal kiye jo humare mann mein utpann huye the aur unka bahut sahaz tareere se uss parmeshwar ne hume jawab diya, chaliye hum aapko batate  hain ki humne uss parmeshwar se aise kya sawal kiye aur unka kya jawab unhone hume diya....



humne prabhu se puchha "Hey Prabhu hume bataye ki jaise shaashtron mein likha hai Naari ke vishaye mein ki ek naari ko apne pati par poorn roop se samarpit hona chaahiye, yadhhapi uska pati uss par chaahe jaise bhi atyaachaar kare kintu usse sab kuch sahna chaahiye, usse ye samajhna chaahiye ki ye uske apne pichhale janmon ke paap hain jo iss janm mein apne pati dwaara kiye gaye atyaacharon se dhul rahe hain arthaath wo unse paap mukt ho rahi hai, humne kaha ki prabhu ye kaisa nyaaya hai aapka jahan ek aurat ko pati vrata kah kar uska shoshan kiya jaata hai wahi purush ko aapne hi itnaa swatantra chhoda hua hai, jabki aap to kahte hain ki aapki nazar mein stree purush sab baraabar hai fir stree ka itnaa shoshan kyon prabhu?????


Prabhu ne kaha, " unhone kuch vayavshtaaye banayi thi taaki srishti mein ek praani ka doosre praani par arthaath maanav ka maanav ke prati vyavhaar baraabari arthaat samaanta, prem, vishwaas, bhaichaare, netiktaapoorn aur ek doosre ko samman dene wala ho, koi shaktiwaan shaktiheen ka shoshan na kare, shaktiwaan aur saamarthpoon praani ashaktiheen aur asaamarthpoorn praani ki sahaayata hetu sada tatpar rahe,

   Ishwar kahte hain unhone shrishti nirmaan aur uske sanchaalan hetu Stree aur Purush donon ko samaan samajh kar hi iss shrishti par bheja tha kyon ki donon mein kisi ek ki majoodgi bina iss shrishti par jeevan ka aana hi asambhav hai, kintu samay ke saath maanav ne hi kuch vyavshtaye aur parmparaye banani shuru kar di, haalaki shuruaat mein unka uddeshya achhe kaarya ke liye hi nirdhaarit hua tha jaise"naari ko sada apne steetva ka paalan karna chaahiye,ye vayashtha isliye banayi gayi thi taaki bhavishya mein kisi bhi prakaar ke lobh laalach mein aa kar wo path bhrasht na ho jaaye athwa koi usse behlaa fuslaa kar path bhrasht kar ke vyaabhichaarini na bana de, isliye ye kaha gaya ki naari ko sada apne sateetva ka paalan karna chaahiye chaahe uska pati uss par kitne hi anaachaar kyon na kare wo inhe apne poorva janmon ke paapon ka fal samajh kar chupchaap sahti rahe kintu kisi behkaave mein aa kar vyaabhichaarini na ban jaaye, aisi vayashta isliye kari gayi taaki buri pravatti ke log usse ashaaye jaan kar usse kahi patit na kar de, patit hone se achha hai ki wo apne pati ke dwaara mile atyaachaar hi sahtee rahe",


kintu prabhu ye bhi kahte hain ki iske saath ye bhi vyavshta ki gayi jo purush apni patni avam ghar ki sabhi streeyon ka samman nahi karta usse samast devi-devta rusht ho jaate hain, bhale wo apnee taakat ke nashe mein aa kar apne ghar ki kisi bhi stree par anaachaar kare par ek nishchit samaye aayega jab usse uske iss kukritya ke liye uss parmeshwar dwaara jawab maanga jaayega, stree sada purush ke liye poojniye, aadarniye, sahyogini, sachhi saathini, aur ek sachhi mitra rahi hai, kintu jab ek purush uss par atyaachaar karta hai tab stree purush ke ye sambhandh tootne lagte hain, aur jab ye pavitra sambhandh tootne lagte hain to aise purush se wo Ishwar bhi prasann nahi rahta aur samaye aane par aise purushon ko kathor dand deta hai,

Ishwar kahte hain ki stee khud itnee saksham hai ki aise purushon ko khud dand de kintu praachinkaal mein ye vyavshtha isliye banayi gayi taaki stree waisa hi vyavhaar na kare jaisa purush kar ke ishwariye dand ka bhaagi banta hai, stree ko dooshon se mukta rakhne hetu hi praachinkaal mein ye vyavshta banai gayi thi"


fir humne Ishwar se puchha ki prabhu ye kaisi vyavhtha aapne banai hai ki ek purush to chaahe jitnee shaadi kar le kintu ek aadarsh stree kewal ek hi shaadi kar sakti hai, usse pati vrata kah kar kewal ek hi shaadi ki anumati aapne di hai, ye bhed bhaav kyon prabhu??

Ishwar ne kaha, " Paramparaye, Vyavshtaye, Reeti-Riwaaz, Vesh-bhoosha, Booli-Bhaasha ye sab desh/kaal/paristithiyon ke anusaar badalta jaata hai, Prabhu kahte hain ki unhone koi parampara, vyavshta, reeti-riwaaz, vesh-bhoosha aadi ka nirmaan nahi kiya, unhone kewal jeev ka nirmaan kiya hai, aur jeev ne apne jeevan ko suchaaru roop se chalaane ke liye hi inn samast cheezon ka nirmaan kiya, haalaki uska niramaan karte samay uddeshya nek tha kintu badalte samaye ke saath unme khaamiya aane lagi,"


humne fir puchha prabhu se kintu prabhu isme kya bhalayi chhipi thi, isse to saaf saaf lag raha hai ki stree ka purush dwaara shoshan ho raha hai, aur aap isme bhalai batate hain????

Prabhu bole Aadi kaal se le kar ab tak kewal ek Stree vivaah hi aadarsh vivaah maana jaata raha hai, praachin kaal ke rishi-muni, tapashvi avam aadarsh raaja bhi kewal ek stree vivaah hi karte the, kintu vyavstha jarur thi ki wo ek se adhik vivah kar le kintu nahi karte the, kintu  purushon ke liye ek se adhik vivaah ka uddeshya ye bhi hota tha ki yadi kisi kanya ka vivaah kisi kaaran se ek avivaahit purush se na ho raha ho ya kisi kanya ko ek shaadi-shuda purush se preet ho gayi ho to wo usse vivaah kar sakti hai, iss prakaar praachinkaal mein aisi vyavsha manav dwaara banayi gayi thi,


humne fir prabhu se poocha ki hey prabhu kintu aisa kewal purushi hi kar sakta hai, kintu kya stee ho bhi ye hi adhikaar prapt hai ya tha to unhone kaha Desh/Kaal/Parishtithiyon ke anuroop streeyon ko bhi aisa hi adhikaar praapt tha, kintu fir bhi aadarsh vivaah Stree-Purush ke liye kewal ek patni-pati vivaah hi sadiyon se shreshtha maana gaya hai aur aaj bhi hai, aur aise dampatiyon  ko aadarsh dampati kaha jaata hai jo na kewal ek pati-patini pratha ka paalan karte hain apitu ek doosre ke prati poorn roop se samarpit hai aur ek doosre ka maan samman karte hain.


humne fir puchha prabhu se " Hey Prabhu kya aapne sachh mein inn vyavshthaon aur parmparaon ka nirmaan nahi kiya??"

Ishwar ne kaha, "Nahi, maine to kewal shrishti, bhotikta aur jeevan ka nirmaan kiya hai, haan agar vyavshta ke vishaye mein main kahu to maine kewal prem, sahanubhooti, ekta, akhandta, maan-samman, bhaichaara,dvesh, raag, bhed-bhaav rahit aur samast burai rahit ek praani samaj ke kaayam rakhne ki vyavtha ki thi, dharm aur bhakti ki vyavstha ki thi, maine kewal ye hi vyavthaaye ki hai kintu meri vyavthaon ko maanav jaati ne apni parmpara na maan kar apni hi alag vyavtha banayi aur unhe parampara ka naam diya hai,"

prabhu kahte hain jo maanav dwaara banai gayi vayvshta ki bandishon ko tyaag kar kewal ishwariye vyashta ka anusaran karte hai wo anannaya moksh ka paatra bante hain, iss bhotikta mein bhale usse kashta atyadhik mile kintu jab iss bhotik shareer ka wo tyaag karega tab uske paas kewal sukh-shaanti ke atirik aur kuch na hoga jo usse iss naashwaan mrityu lok mein kabhi kisi ko nahi mil sakta aise aseem sukh ka wo bhaagi banega, kintu jo vyakti iss bhotik shareer ke bhogon mein vileen ho kar prabhu dwaara batayi gayi vyavshtha ka paalan nhi karte unhe bhotik shreer ke tyaag ke pashchaat anannaya kasht ka bhaagi hona padta hai aur tab unke paas kewal pachhtave ke siwa aur kuch nahi hota...

Thursday, 18 April 2013

Ishwar Vaani-30 **vayastha aur parmpara **

Ishwar kahte hain ki unhone manav-manav mein kisi prakaar ka bhed-bhaav nahi kiya hai, unki nazar mein sab samaan hai, wo stree-purush avam samast jeev jantuon ko samaan hi prem karte hain, Ishwar kahte hain ki wo humse bhi aisi hi ummid karte hain, Ishawar kahte hain ki jab iss sansaar ka rachiyta kisi bhi manushya mein kisi bhi prakaar ka bhed-bhaav nahi karta to hey manushyu tum kyon rakhte ho kya tum uss parmeshwar se bhi bade ho jo iss jagat ka rachiyata hai tatha jisne tumhe aur samast jagat ka na sirf nirmaan kiya apitu jeevan aur mrityu bhi jiskee daasi hai, wo bhed-bhaav kisi bhi praani mein nahi rakhta to tum kya soch kar rakhte ho,

prabhu kahte hain " Hey manushyon tum kis khokhali vayastha aur parmpara ke naam par kuritiyon ka bojh sadiyon se apne upar laade firte ho, inhe tyaag do, maine to kabhi koi vyastha aur parampara aisi nahi banayi jo sansaar mein kuriti ka kaaran ban jaaye, jahan bhed-bhaav utpann ho, jahan ek maanav doosre ko neecha samjhe, maine to parampar aur vayvshta ke naam par Dharm arthaat satkarm ki vyavshta ki thi, taaki sansaar mein sadev samast praaniyon mein samaanta avam prem bhaav kaayam rahe, maine kabhi koi aisi vyavshta  nahi ki jo stree-purush mein bhed-bhaav kare, purush-purush mein aur stree-stree mein bhed-bhaav rakh kar ek dusre ko neecha samjhe, jaati-dharm, ameer-gareeb aur unch-neech ke naam pe praaniyon mein bhed-bhaav kiya jaaye"


Prabhu kahte hain jo Dharm, Vyavshta aur Parampar ke naam par samast praaniyon ka shoshan karte hain, main kahta hoon ki wo Adharmi ban jaaye, kyonki agar wo Adharmi ban kar meri batayi hui baaton ka anusaran karege to bhale wo iss jagat ke liye avam iss sansaar ki nazar mein wo dhoort ban jaaye kintu meri nazar mein wo mere priye honge, kyon ki main aisee har ek vyastha, parampara aur dharm ka virodh karta hoon jo iss shrishti ko bhed-bhaav swaroop aapas mein baant deti hai, isliye hey maanavo jo tumhare liye dharm hai, vyastha hai aur jis khokhali parampara ke naam pe tum sadiyon se praaniyon ka shoshan karte aaye ho usse band karo avam ishwar dwaara bataye gaye maarg par chalo anyatha tumhare ant samaye mein tumhe ishwar ke virudh jaane ke apraadh mein kathor dand diya jaayega..

Ishwar Vaani-29**Prabhu kahte hain ki hume kabhi apne shareer ke moh mein aur iski sulabhta ke liye sada bhog-vilaas mein vileen nahi rahna chaahiye**

  prabhu kahte hain shareer ka mrityu ka praapt hona humare paapon ka ant hona hai, Ishwar kahte hain ki humara shareer hi aisa hai jo paap karta hai, aur yadi isse mrityu na aaye to ye aage bhi paap karta rahega, isse rokne ke liye hi parmeshwar ne mrityu nirdhaarit ki hai taaki ek nishchit samay taka aur nishchit samay baad praani ko apne iss paapi shareer se mukti mil jaaye.

Prabhu kahte hain chaahe hum kitnaa bhi punya karm kar le kintu jaane anjaane humse din mein kitne hi paap ho jaate hain, prabhu kahte  hain ki yadi raat mein sone se poorva apne samast paapon ke uss parmeshwar se shhama maang li jaaye sachhe hriday se aur usse kaha jaaye ki "hey prabhu mujhse aaj jo bhi jaane anjaane paap huye hain kripya kar mujhe maaf kar de, main apne sabhi paapo ke praayshchit ke liye taiyaar hoon par tu mujhe shhama kar apna le", aisa kahne se Ishwar hume jaane-anjaane huye paap karmo se shhama kar moksh pradaan karta hai,

Prabhu kahte hain ki hume kabhi apne shareer ke moh mein aur iski sulabhta ke liye sada bhog-vilaas mein vileen nahi rahna chaahiye kyon bhotikta ka prateek ye maayaroopi shareer ek din nasht ho jaayega, Prabhu kahte hain ki hume iss shareer ka upyog sada satkarm karne, prabhu bhakti karne aur sada satmaarg aur moksh paane hetu karna chaahiye.


prabhu batate hain ki log kahte hain wo to mrit praaniyon ko bhi jeevit kar dete hain, ishwar kahte hain haan wo aisa karte hain, ishwar ki nazar mein wo uss paapi shareer ka ant karte hai jiske vash mein aakar praani maatra ki pavira aatma galat kaarya mein uski bhaagi banti hai, kintu yadi praani aatma se shudh hai kintu uske shareer ne mastishk avam bhotikta ke adheen ho kar adharmi aur galat kaaryon ko anjaam diya hai kintu uski aatma iska virodh karti hai avam anim samay tak iska prayshchit chaahte hai to prabhu praani maatra ki mrityu ke pashchaat jeevit avshya karte hain arthaat uske paapi shareer ke nasht hone ke pashchaat uski pavitra aatma ko apne mein sama lete hain jisse kahte hain wo parmeshwar wo mrit praaniyo ko bhi jeevit kar deta hai..



ek stree hoon main-Kavita


Haan  ek stree hoon main, main hi ek maa, premika, patni,  beti aur bahoo hoon kyonki haan  ek stree hoon main,
Main hi saas, nanad, jethaani aur devraani hoon, main hi mausi, chaachi aur maami hoon kyonki haan  ek stree hoon main,
main hi Daadi aur Naani hoon, baalika, yuvati, adhed aur bujurg hoon main, kal aaj aur kal bhi hoon main, main jagat ki janani aur apno ki paalanhaar hoon, 
karte hain poojan log mera vidhata ka hi ek roop samajh kar, bulaate hain log mujhe apna bhaagya samajh kar, lekin jab main aati hoon uss ghar mein beti, bahoo aur patni ban kar lagti hoon khalne unhe jaane kyon, hoti hoon apmaanit jab main chali aati hoon unke ghar aangan mein usse apna samajh kar shayad isliye kyon ki ek stree hoon main,

par nahi karti kabhi koi shikwa kisi se, nahi rakhti koi gila kisi se,aur karti rahti  hoon sada roshan uss ghar ko jahan main hoon rahti, karti hoon arpan uss ghar aangan ko jahan main hoon rahti, samajhti hoon sab ko apna, nahi karti apna aur begaana, deti hoon chhoto ko pyaar aur apno ko samman kyonki haan  ek stree hoon main,

Nahi maangi iss duniya se apne liye kabhi dua, karti hoon fariyaad bhi uss rab se jinke ghar aangan mein rahti hoon main, nahi koi khushi meri zindagi mein bin apno ki khushi mein, nahi zinadagi mein meri koi umang bin apno ke saath mein, hai samarpit apna jeevan bas apno ke saath mein kyon haan ek stree hoon main,

Reeti riwazon ke naam se hona padta hai mujhe apne janm dene walon se juda, apnana padta hai unhe jo hote hai ajnabi aur hote hain mere mata pita se ek dam juda, par kar ke khud ko uss ghar aanagan mein samarpit apna leti hoon unko bhi, karti hoon pyaar uss ghar ko bhi jahan main hoti hoon kabhi ajnabi auron se bilkul juda, maan kar unhe hi fir apna ho jaati samarpit uss ghara aangan mein kyonki  main ek stree hoon,

par aaj baith akele mein sochti hoon main, nahi maangi kabhi koi dua bhi uss rab se apne liye,kisi se apne liye bhi na chaaha hai abhi tak kuch,

 karti hoon roshan har uss ghar ko jahan main jaati hoon pahuch, reeti riwazon ke naam pe mera daan diya jaata hai kar, pahucha ke ek ajanabi ghar mein mata-pita ko bhi hota hai bada harsh, main bhi unki khushi ke khaatir uss pareewar ko bhi  hoon apna leti, uss ghar aangan mein bhi hoon khud ko hi samarpit kar deti, nahi maangti apne liye koi dua, karti hoon fariyaad bhi unke liye jinke saath mera janm se le kar maran tak ka rishta hai juda hua(maayeke se sasuraal tak),

sochti hoon aaj main kar ke apni khushiya apno ke naam aakhir mujhe mila kya, kadam-kadam pe apmaan aur ashkon ke siwaa iss duniya ne mujhe diya kya, kasoor kewal itnaa sa hai ki haan ek stree hoon main, kasoor shayad itnaa sa hai apno pe samarpit hoon main, kasoor itnaa sa hai shayad mera ki apno se karti hoon beshumaar mohabbat hoon main, badle mein nahi maangti unse kuch, badle mein nahi chaahati chaahat ke siwa aur kuch, sone-chaandi aur dhan-daulat bhi thukara deti hoon apno ke liye main, par fir  bhi kyon nahi iss samaj mein samman ke kaabil hoon main kya isliye ki aur stree hoon main,

kyon kadam-kadam par mera upahaas hota hai, kyon har kadam pe ye samaj meri izzat har baar taar taar karta hai, hoon main har kahi aur har jagah fir kyon nahi iss duniya mein samman ke laayak hoon main, hoon nahi bebas main par haan bandhi hoon apno ke pyaar mein jarur main, hoon nahi bebas main haan thaam rakhi hai door apne ghar aangan ke khushi ki maine, hoon nahi mazboor ki je na saku apne liye par  jeeti hoon fir bhi iss samaj ke har ghar mein pareewar ki khushi ke liye, isliye nahi ki ek stree hoon main, bebas aur laachaar hoon main, jeeti hoon bas ek ummid ke saath kaash samajh aa jaaye iss duniya ko ki main koi nirzeev nahi balki jeeti –jaagti  jeev hoon main,  nahi karti laalsa kisi se bas aaj itnee se karti hoon de ye samajh poora adhikaar mujhe bhi  zindagi jeene ka, mile mujhe bhi har samman zindagi jeene ka, bas jyada kuch nahi chaahati hoon main, kewal  duniya se baraabari ke hak ki abhilaashi hoon main,apno ke pyaar ki pyaasi hoon main, jhooth aur dhokhe se dur bas ek pyaar bhari duniya chaahati hoon, ek samman bhara jeevan jeena chaahti hoon  main, bas itnaa hi chaahti hoon main  kyonki haan ek stree hoon main,


Thanks & Regards

     Archu