Monday, 21 August 2017

ईश्वर वाणी-२२०, दशेहरा रावण का मुक्ति दिवस

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यद्दपि तुम अब तक दशहरा पर्व श्री राम की विजय और अत्याचारी रावण की मृत्यु की ख़ुशी में मानते हो, किंतु जिस बुराई के प्रतीक रावण के अंत की ख़ुशी में ये उत्सव मनाते हो क्या तुम्ने खुद अपने अंदर से इनका अंत किया है, ये न भूलो अपने अंदर के रावण को मारने के लिए कोई बहार से राम नहीं आयेगा अपितु तुम्हे खुद आत्मबल बढ़ाना होगा और अपने अंदर के रावण का अंत करना होगा।

हे मनुष्यों जिस रावण के अंत की ख़ुशी में दशहरा पर्व तुम मनाते हो दरअसल  ये उत्सव उसकेअंत का नही अपितु उसके मुक्ति दिवस का  है, एक  राक्षस योनि से मुक्त हो कर बैकुंठ में स्थान प्राप्त कर श्री हरी के चरणों में स्थान मिलने की ख़ुशी।

एक अत्याचारी आतताई बुराई के प्रतीक अपने समस्त जीवन को बुराई में लगाने बाद भी बैकुंठ में स्थान प्राप्त, साक्षात् श्री हरी के हाथो देह त्यागना ये सब उसके पिछले जन्म के कर्मो से संभव हो सका, और इस प्रकार तमाम बुरे कर्म के बाद भी बैकुंठ में स्थान उसे मिला।

इस प्रकार ये त्यौहार केवल महज़ बुराई का पुतला फूंक दे कर ख़ुशी मनाने का नहीं अपितु अपने अंदर की बुराई का अंत खुद अपने अंदर बैठे राम द्वारा करा कर साथ ही उस रावण के मुक्ति दिवस के मनाने का है ताकि उसकी तरह तुम्हारी आत्मा भी शुद्ध हो कर मोक्ष को प्राप्त हो सके।"

कल्याण हो

Sunday, 13 August 2017

ईश्वर वाणी-२१९, एकेश्वरवाद की स्थापना

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यु तो संसार की सभी प्राचीन सभ्यता मूर्ती पूजक और बहुएश्वेर पर आधारित रही है किंतु समय के साथ लगभग सभी का अंत हो गया और संसार में एकेश्वरवाद की स्थापना हुई।

हे मनुष्यों मैं ये नही कहता की प्राचीन सभ्यता की मान्यता गलत थी और आज एकेश्वरवाद सही अथवा प्राचीन धार्मिक शाश्त्र गलत थे और आज के सही। किंतु उन सभ्यताओ का अंत इसलिये हुआ क्योंकि मनुष्य जाती, सम्प्रदाय, भाषा के आधार के साथ उक्त देवी देवताओ को मानने वाले को नीच और खुद को श्रेष्ट समझते थे, धार्मिक स्थानों को तोड़ कर उक्त राजा की हार का उत्सव मनाते थे, बहुएश्वरवाद में अन्य कुरीतिया जन्म लेती गयी। मनुष्य अब खुद मेरी सत्ता को चुनोती दे खुद को ईश्वर समझने लगा, जो शक्तिशाली था राजा था वो स्वम को ईश्वर कहने लगा, मानव व जीवो का शोषण करने लगा।

हे मनुष्यों संसार में जब जब और जहाँ जहाँ इन कुरीतियो का प्रभाव अत्यधिक बड़ गया और मानव जाती व जीवो का अत्यधिक शोषण होने लगा मैंने ही अपने एक अंश को उस स्थान पर भेज कर एकेश्वरवाद की नीव रखवाई, ताकि एक ही ईश्वर को मानने वाले मनुष्य कोई किसी को किसी भी आधार पर नीचा न समझे, खुद को ईश्वर न समझे, एक ही शक्ति जो सर्वोच्च है उसी की सब आराधना करे, सभी को समान पूजा का अधिकार हो, सभी के धार्मिक शाश्त्र एक ही हो ताकि कोई किसी के धार्मिक शाश्त्र को नुक्सान न पंहुचा सके, संसार में एकता और प्रेम का प्रचार और प्रसार हो सके।

हे मनुष्यों इससे पूर्व जब संसार में बहुएश्वरवाद व् मूर्ती पूजा की प्रथा थी तब मनुष्य अधिक हिंसा प्रधान हो चूका था कारण उस समय के धर्म शास्त्र भी कई लड़ाइयो का वरनन करते थे एवं तमाम देवी-देवताओ की विजय का गुर्गान करते थे, फलस्वरूप उस समय का मनुष्य भी खुद को उनसे प्रेरणा ले कर उन शाश्त्र का सही अर्थ भुला कर निरीहो का दोहन व् शोषण करने लगा और धीरे धीरे खुद को ही भगवान कहने लगा।

इसी झूठी अहं की भावना को दूर करने हेतु ही मैंने देश,काल,परिस्तिथि के अनुसार अपने ही एक अंश को धरती पर भेजा और एकेश्ववाद की नीव रखवाई,  संसार में व्याप्त बुराई के अंत के लिए व् खुद को भगवान समझने की मनुष्य की इस सोच को खत्म करने के लिए देश, काल, परितिथि के अनुसार मेरे ही अंश ने मनुष्य के अनेक अत्याचार सहे, उन्होंने हिंसा का मार्ग नही अपनाया, और धीरे धीरे देश, काल, परिस्तिथि के अनुरूप मनुष्य उनसे जुड़ते गए, इस प्रकार प्राचीन बहुएशरवादि प्राचीन सभ्यता मिटती चली गयी और संसार में एकता और प्रेम की स्थापना हुई। 

हे मनुष्यों किंतु मानव बुद्धि तुम्हारी इस एकेशरवादि प्रथा में भी तुमने अनेक मत ढून्ढ ही लिए जबकि सभी के धर्म शास्त्र एक है किंतु फिर भी अनेक मत बना लिए और एक ही शाश्त्र पर यकीं रखने के बाद भी खुद को श्रेष्ठ और अन्य को नीच बता कर हिंसा करने लगे।

हे मनुष्यों ये न भूलो जिस प्रकार मैंने तुम्हारी प्राचीन सभ्यता का अंत किया था तुम्हारी बुराइयो के कारण यदि तुम फिर वही दोहराओगे तो अब मैं सभी मानव जाती का अंत कर दूंगा, समय है सुधर जाओ और मेरे बताये रास्ते पर चलो उसका अनुसरण करो तथा अनन्त जीवन को प्राप्त करो।"
कल्याण हो

Saturday, 5 August 2017

प्रभु गीत


"तेरा ही नाम लू सदा, तुझको ही में पुकारू
दिलमे आओ प्रभु, पल पल तुम्हे पुकारू-२

कोई कहे ईश्वर तुम्हे कोई अल्लाह तुम्हे पुकारें
कोई कहे गुरु तुम्हे कोई मसीह तुम्हे पुकारे
मैं अज्ञानी क्या कहूँ, आज तुही मुझे बता रे-२

बिखरी हुई ज़िन्दगी मेरी, टूट चूका विश्वास है
आजा बन कर ईश्वर तू या अल्लाह बन सवारे

हर दिन लेता नाम तेरा फिर क्यों ठोकर खाता
तेरी करता रोज़ आराधना तेरी ही आरती गाता
फिर क्यों मेरे मालिक मैं हर दिन धोखा पाता-२

सच्चा तेरा नाम है माना मेरा विश्वास अधूरा
दिलमे आकर आज कर दो इसे तुम ही पूरा

कोई कहे ईश्वर जिसे कोई कहे अल्लाह उसे
मैं बालक नादाँ न जानू कितने है तेरे नाम हुये-२

जाने कितने नामो को याद रखु कैसे इन्हें संभालू
किन किन नामो से मेरे मालिक तुमको मैं पुकारू-२



तेरा ही नाम लू सदा, तुझको ही में पुकारू
दिलमे आओ प्रभु, पल पल तुम्हे पुकारू-२"


गीत-मोहब्बत मैंने भी की है

"ज़िन्दगी की एक बस खता ये मैंने की है
एक बेवफा से मोहब्बत मैंने भी की है-२

लुटाई थी हर खशी उसे अपना समझ कर
भुला गया मुझे वो एक सपना समझ कर

चाहा था उसको ये ज़िन्दगी समझ कर
दिल में बसाया था धड़कन समझ कर

ज़िन्दगी की एक बस.....................

ना सोचा ना समझा था मोहब्बत में मैंने
एक बेवफा से आशिकी मैंने की है

तोड़ गया दिल मेरा वो शीशा समझ कर
छोड़ गया तनहा मुझे हर मोड़ पर

ज़िन्दगी से अपनी एक बस शिकायत यही है
क्यों उस बेवफा से मैंने मोहब्बत हाँ की है

लबो से छीनी उसने मुस्कान मेरे
छीनी हर ख़ुशी उसने ज़िन्दगी से मेरे

मोहब्बत में झूठे ख्वाब दिखाता था
मोहब्बत के झूठे वादे निभाता था

अश्को की अपनी आज ये कहानी लिखी है
उनकी बेवफाई की बस ये बयानी लिखी है
क्या क्या कहु क्या मैं छिपाउ अब किसीसे
टूटे दिल की दास्ताँ अपनी जुबानी लिखी है

ज़िन्दगी की एक बस खता ये मैंने की है
एक बेवफा से मोहब्बत मैंने भी की है-४"

Sunday, 9 July 2017

कविता

कविता

"ज़िन्दगी में हर पल खुदको तनहा ही पाया
हर किसी से ज़िन्दगी में बस धोखा ही खाया
हम तो पहले ही घायल थे रिश्तों की चोट से
ऐसा हर शख्स मेरी ही ज़िन्दगी में क्यों आया

अश्को के सिवा यहाँ कुछ भी हमने न पाया
अपना बता हर शख्स ने हमको तो रुलाया
एक प्यार की ही चाहत दिलमे रखते थे हम
अफ़सोस कभी किसी का प्यार न मिल पाया

सूरत नहीं सीरत से हमने सभी को अपनाया
हर किसी शख्स ने मेरे अरमानो को दफनाया
सीरत भली जता दिलमें बस जाने लगे थे वो
एक दिन किसी और को अपना,हमे गैर बताया

हर रिश्ते को मान अपना प्यार सब पर लुटाया
है नही कोई गैर, सभी को यहाँ अपना बताया
सोचते थे सब अपने ही तो है इस गुलिस्तां में
पर कोई अपना कहने वाला मुझे ना मिल पाया"😢😢
--
Thanks and Regards
*****Archu*****

Thursday, 6 July 2017

कविता-एक बार कहा था


"हम तो आज भी वही है ठहरे
जहाँ तुमने कहा था जरा रुको

हम बस अभी थोड़ी देर में आते है
दिन, सप्ताह, बीतेे माह और साल

गुज़र गयी उमर बीत गयी ज़िन्दगी
तुम्हारे इंतज़ार में बैठे यहाँ आज भी

जहाँ तुमने लौटने का वादा किया था
वफ़ा के बदले बेवफाई निभाई तुमने

करते रहे है फिर भी ऐतबार तुम्हारा ही
तुमने फिर मिलने को एक बार कहा था'😢😢😢😢😢

कविता-ज़िन्दगी मेंरी ठहर सी गयी

"ठहरे हुए पानी की तरह, ज़िन्दगी मेरी ठहर सी गयी
अतीत में खोया है आज, कैसे इश्क में ज़हर पीती गयी

करती हूँ याद आज भी, जो गुज़ारी थी शामें इंतज़ार में
सोचती हूँ आज मैं, कैसे इतनी बड़ी भूल में करती गयी

इश्क की रंगीनियों को, बस झरोखो से ही देखती थी
मोहब्बत को जींदगी, और उसे खुदा मैं समझती गयी

आदत डाल कर अपनी, मुझे ठुकराने लगा वो हर पल
प्यार उसका समझ कर, अश्क अपने मैं बस पीती गयी

एक दिन अहसास, शायद तुझे होगा मेरी आशिकी का
हर दिन ये ही सोच कर, मर मर कर मैं बस जीती गयी

ठहरे हुए पानी की तरह, ज़िन्दगी मेरी ठहर सी गयी
अतीत में खोया है आज, कैसे इश्क में ज़हर पीती गयी-२"

Sunday, 2 July 2017

कविता-न तन्हाई जाये

करके वफा तुझसे, नसीब में मेरे तो बेवफाई आये
कर हर खुशी नाम तेरे, ज़िन्दगी से न तन्हाई जाये

'मीठी' सी चाहत का, एक ख्वाब देखा था बस मैंने
तोड़ कर हर ख्वाब, 'ख़ुशी' क्यों हर बार रुलाई जाये

तेरे ही इश्क में 'मीठी', भुलाई है मैंने दुनिया सारी
तुझसे क्यों न 'ख़ुशी' से, दुनिया ये भुलाई जाये

याद में तेरी, कितना तड़पती है 'मीठी' पल पल
'ख़ुशी' इन लबो पर, तुझसे आखिर न लायी जाये

'मीठी' बातो से दिल, चुराने वाले ए मेरे हमनसिं
'ख़ुशी' की कोई बात, तुझसे न कभी बताई जाये

मेरी मोहब्बत को, कर दिया बदनाम तुमने जग में
फिर भी मिलाते हो आँखे मुझसे, ये न छिपाई जाये

की है आशिकी यहाँ, तुमने भी कभी किसी से तो
क्यों आखिर, तुमसे ये अब न किसिसे जताई जाये

कमी क्या लगी, तुम्हे मेरी मोहब्बत में ऐ मेरे हमदम
कुछ आज तुम मेरी सुनो, कुछ तुम्हारी सुनाई जाये

न बैठो अब और खामोश तुम, बोलो न मुह फेरो तुम
गुमसुम बहुत रह लिये, आज कुछ अपनी बताई जाये

करके वफा तुझसे, नसीब में मेरे तो बेवफाई आये
कर हर खुशी नाम तेरे, ज़िन्दगी से न तन्हाई जाये-2

 कॉपीराइट@मीठी-ख़ुशी(अर्चना मिश्रा)

Saturday, 1 July 2017

मुक्तक

"खोया था कभी दिल मेरा भी इन वादियो में
पाया था मैंने भी उन्हें ही इन वादियो में
मोहब्बत के सौदागर निकले वो मेरे हमदम
मिले थे कभी हम उनसे भी इन वादियो में"

"रह रह कर मुझे तेरी याद आती है
पल पल मुझे ये कितना सताती है
दूर जा कर मुझसे खुश है कितना तू
याद तेरी इन आँखों पर अश्क लाती है"

"दिल तोड़ कर मेरा चला गया हरजाई
 वफ़ा के बदले उसने दी बस बेवफाई
 मैंने तो जान भी कर दी थी हवाले उनके
 मेरी मोहब्बत पर उसने दया भी न दिखाई"

Tuesday, 27 June 2017

मुक्तक

"जाने कैसे सबको उनका प्यार मिल जाता है
जाने कैसे सबको उनका यार मिल जाता है
हमको तो मिलते है मोहब्बत में ठग हर मोड़ पर
जाने कैसे सबको उनका संसार मिल जाता है"

Monday, 26 June 2017

ईद मुबारक

"ऐ खुदा कुछ ऐसी रहमत कर दे
 इस ईद पर गरीब का पेट तो भर दे
 रोये न भूख से बिलखकर कोई फिर
खुदा करिश्मा तू आज ऐसा कर दे"

Sunday, 25 June 2017

लेख--हिन्दू धर्म नही बल्कि एक प्राचीन सभ्यता

"मैंने एक रिसर्च की और पाया की जो लोग 'हिन्दू' को धर्म कहते है वो
अज्ञानी है, क्योंकि सच्चाई ये ही है हिन्दू कोई धर्मं नहीं, तभी
शास्त्रों और ग्रंथों में कही भी हिन्दू धर्म और हिंदुत्व का जिक्र नहीं
नहीं है।
अब लोग कहेंगे हिन्दू धर्म नहीं तो क्या है? क्या मुझे हिंदुत्व से
दिक्कत है?? तो उन्हें मैं बता दू हिंदुत्व से मुझे दिक्कत नही, पर
हिन्दू एक धर्म भी नही ये सत्य है, 'हिन्दू' एक सभ्यता है, विश्व की अनेक
प्राचीन सभ्यताओ में से अभी तक जीवित बची सबसे विकसित प्राचीन सभ्यता जो
प्राचीन काल से अब तक अपना अस्तित्व बचा कर रख पायी है, हालांकि अब इसमें
बहुत बदलाव आधुनिकता के आधार पर आ चूका है फिर भी मूल तत्व अपने साथ लिए
ये आज भी जीवित है।
'हिमालय पर्वत श्रंखलाओ से हो कर अनेक नदियो के किनारे' एक विशाल विकसित
सभ्यता का विकास हुआ, हिन्दू का 'हि' शब्द उसी हिमालय के समीप व् 'न्द'
शब्द नदी किनारे बसी उसी सभ्यता के विषय में जानकारी देता है, यहाँ पर
रहने वालो को ही हिन्दू कहा जाने लगा।
विश्व की सबसे प्राचीन और विकसित सभ्यता के नाम पर ही उसके समीप बहते
विशाल सागर को ही हिन्द महा सागर कहा गया, याद रखने योग्य ये है अभी तक
किसी धर्म के नाम पर किसी नदी या सागर का नाम नही रखा गया है, केवल हिन्द
महा सागर नाम क्यों ?? क्योंकि ये धर्म नही बल्कि प्राचीन विकसित और अब
तक जीवित इकलौती सभ्यता है।
तभी सभी हिन्दुओ के नाम, भाषा, रीती रिवाज़,त्योहार सब अलग है, कारण केवल
हिमालय तथा उससे निकलने वाली नदियो के किनारे बसे लोग, सभी ने अपने
अनुसार भाषा बोली, रीती रिवाज़ और त्योहार मनाये, तभी एक ही नाम की
धार्मिक पुस्तक 'रामायण' दक्षिण में अलग और उत्तर भारत में अलग
तथामलेसिया व् इंडोनेशिया में अलग है।
यदि ये धर्म होता तो मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध आदि धर्मो के सामान
इसके मानने वाले एक ही त्योहार करते, रीती रिवाज़ एक होती, एक भाषा मुख्य
होती, किंतु ऐसा नही है।
अब सवाल उठता है विश्व की सबसे प्राचीन विकसित सभ्यता आज इतनी कम क्यों रह गयी?
इसका उत्तर है समय के साथ इसमें आई बुराई, और उन बुराइयों को दूर करने के लिए आने
अनेक मतानुयायी आये, जिन्होंने उसकी बुराई दूर करने के लिये उपदेश दिए,
जिन्होंने उन उपदेशो को माना वो उसी मत अर्थात धर्म को मानने वाले होते
गए, बाद में कुछ शाशको ने बलपूर्वक या लालच दे कर इस सभ्यता के लोगो को
बहका कर किसी दूसरे मत अपने
अनुसार किया, फलस्वरूप आज ये सभ्यता विश्व
में इतनी ही बची है।
किंतु उम्मीद है दुनिया का हर देश आज इस अत्यंत प्राचीन सभ्यता का शोषण
और खत्म करने की अपेक्षा बचा कर रखेगा, यही सभ्यता है अब बची है जब मानव
इतिहास की पूर्ण व्याख्या करती है।
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*****Archu*****
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Saturday, 24 June 2017

कविता-मुझे मिटाया

"दुनिया में जब जब मैंने दिल लगाया
धोखा ही हर उस शख्स से पाया
कसूर फिर भी किसी का नही शायद
किस्मत ने उन्हें आखिर मुझसे मिलाया

ख़ुशी की चाहत दिखा सभी ने रुलाया
इश्क के नाम पर सभी ने सताया
मीठी बाते बना सदा बहलाते रहे मुझे
पर वफा का वादा न किसीने निभाया

दिलके रिश्ते बना दिलसे से ठुकराया
अपना बना कर भी न अपना बनाया
एक मोहब्बत की ही चाहत की थी
ज़िन्दगी बता अपनी ज़िन्दगी से हटाया

फिर भी साथ रखा तेरी बेवफाई का साया
तूने भुला दिया मुझे पर न मैंने तुझे भुलाया
ज़िन्दगी के आखिर तक एक साथ चाहा था
पर तूने तो ज़िन्दगी से ही मुझे मिटाया"



Friday, 23 June 2017

ईश्वर वाणी-२१८, चौरासी लाख योनिया

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यद्धपि पापी मनुष्य अपने पाप कर्म का दंड इसी जन्म में भोगता है किंतु अनेक पापी अपने पापो का प्रायश्चित नही करते जिसका कारण उनके मन को उनके पाप रुपी शैतान ने ढक रखा होता है, जिसके कारण पाप कर्म का दंड मिलने पर भी प्रायश्चित नही करते और अवसर मिलते ही फिर पाप कर्म करने लगते हैं।

हे मनुष्यों ये मानव देह तुम्हे चौरासी लाख योनयो के बाद मिली है, अर्थात करोडो वषो व् अनेक युगों के बाद, यदि इसे तुम अपनी भौतिक महत्वकांशा पूर्ती में ही लगा देते हो तो फिर करोडो वषो व् अनेक युगों तक मानव देह के लिये तरसते हो।

हे मनुष्यों जीवन को चौरासी लाख योनियो से क्यों जोड़ा गया है इसके विषय में बताता हूँ, चौरासी लाख बार स्त्री तत्व व् पुरुष तत्व के संगम से तुम्हे इतनी ही देह की प्राप्ति हुई है, एक नया जीवन देना तो पाप कर्म में नही आता किंतु स्त्री और पुरुष तत्व का संगम पाप कर्म में आता है कारण कभी ये संगम आपसी सहमति से हुआ तो कभी जोर जबरदस्ती से, इस संगम में ईश्वर को भुला कर सिर्फ आपसी संगम के कारण मन में घृणित विचार रख कर किया मिलन, चौरासी लाख बार हुये इस मिलन के बाद मुक्ति तथा पाप द्वारा जन्म मरण के बन्धन से मुक्त होने के लिए ही मानव देह तुम्हें दी है, ताकि नैतिकता व् सत्कर्म का अनुसरण कर भव सागर से मुक्त हो कर फिर सतयुग में श्रेष्ट जीवन पाओ।


हे मनुष्यों चौरासी लाख योनियो में तुम्हारा केवल देह रुपी जन्म आता है, यद्दपि तुम्हारे प्रेत, आत्मा, निशाचर आदि अनेक सूक्ष्म शरीर में प्राप्त जन्म नही आते"।


कल्याण हो


अर्चना

ईश्वर वाणी-२१७, कर्मफल

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यूँ तो तुम अपनी देह में रह कर अनेक सुख और दुःख प्राप्त करते हो, यद्धपि तुम्हें पहले भी में बता चूका हूँ दुःख क्या है और सुख क्या, फिर भी सारांश में आज इतना ही कहता हूँ 'तुम्हारी इच्छित वस्तु अथवा इच्छा का पूर्ण होना तुम्हे हर्षित करता है, तुम्हे उस भौतिक वस्तु की प्राप्ति ही प्रसन्नता देती है मिलने पर, वही यदि वो वस्तु तुम्हे नही मिलती तो उसका न मिलना ही दुःख का कारन', भाव ये है सब कुछ तुम्हारे अनुसार ही जब होता है तब जो भाव मन में तुम्हारे आते है वही खुशी है चाहे इससे किसी को कष्ट मिल रहा हो पर तुम प्रसनन होते हो क्योंकि सब तुम्हारे अनुसार ही हो रहा है,

वही जब तुम्हारे अनुसार कार्य नही होता, परिस्तिथियां भी विपरीत होती जाती है तब खिन्नता का भाव मन में तुम्हारे आता है जो दुःख का कारण बनता है।

हे मनुष्यों ये मानव जीवन तुम्हे अनेक योनियो के बाद मिला है, तुम्हारे पिछले कई जन्मों के कर्म और इस जन्म के कर्म ही तुम्हे दुःख व् सुख की प्राप्ति करवाते हैं।

जैसे कोई पापी व्यक्ति  इस जन्म में कई पाप कर चुका और फिर भी सुख प्राप्त करता है, ऐसा इसलिये पिछले जन्म के कर्म उसके अधिक श्रेष्ट थे, उनके प्रभाव से उसके बुरे कर्मो का फल इस जन्म में नही मिला किंतु उसने अगला जन्म अपने बुरे कर्मो से खराब कर अगले जन्म के लिए केवल दुःख ही कमाया।

घृणा, झूठा आरोप, अपमान, हत्या, व्यभिचार, रिश्तों की अवमानना, देश ध्रोह, राज ध्रोह, निरीहों और कमजोर को सताना, सदा अपनी ही हाँकना, दूसरो को नीचा समझना, बुरी नियत रखना, संपत्ति हड़पना, दूसरे का हिस्सा छिनना, धन का व् ।मनुष्यों का देह का अभिमान करना ये सब पाप कर्म है, इसका दंड यदि पिछले जन्म के पुन्य पूरे इस जन्म में पूर्ण होते है तो इसी जन्म में दंड मिलता है यद्दपि ऐसा नही होता तो अगले जन्म में तुम्हारे जन्म से लेकर जब तक दंड तुम्हारा पूर्ण नही होता मिलता रहता है।

हलाकि बीच में कुछ वक्त के लिए कष्ट कम जरूर हो जाते है कारण कुछ इस जन्म के अच्छे कर्म व् जो लोग तुमसे जुड़े है उनकी किस्मत तुमसे जुडी जिससे उनके पुन्य कर्म के कारण अस्थाई रूप से कुछ पल के लिए तुम्हारे भी कष्ट कम हो गए।

हे मनुष्यों इसलिये तुमसे कहता हूँ केवल भौतिक वस्तुओं की लालसा कर उन्हें प्राप्त करने के पीछे मत भागो, कर्म मत खराब करो, यही तो असल पूँजी है इसे अधिक कमाओ और संभाल के रखो क्योंकि अगले जन्म में यह ही तुम्हे मिलेगी, अगर अभी बुराई का रास्ता युही अपनाते रहे तो अगला जन्म दुःख में बीतेगा क्योंकि सुख रुपी धन बुरे कर्मो में तुम आज जो खर्च कर चुके हो,

वक्त अभी भी है, इसे न जाने दो, मेरे बताये मार्ग को अपनाओ और सच्ची पूँजी कमा के आनंद प्राप्त करो"


कल्याण हो

कॉपीराइट@अर्चना





Wednesday, 21 June 2017

पौराणिक कथा- भाग-5, जब श्रवण कुमार के मन में भी जागा था पाप


बात उस समय की है जब श्रवण कुमार अपने नेत्रहीन माता-पिता को ले कर चार धाम यात्रा पर निकले थे, चलते चलते वो किसी वन में पहुचे, माता पिता को भूख लगी तो उन्होंने श्रवण कुमार से कुछ भोजन की व्यवस्था करने के लिए कहा, श्रवण उन्हें वन में एक नदी किनारे बैठा कर भोजन की व्यवस्था करने चल पड़े।
उन्हों कुछ जंगली फल मिले, उन्हें ले कर माता पिता के पास आने लगे, उन्हें थकान महसूस हुई तो सोचने लगे एक पेड़ के नीचे थोड़ा विश्राम कर लू फिर चलूँगा आगे, और वो एक पेड़ के नीचे बैठ गए, पता नही कब आँख लग गयी, पर तभी मनमे विचार आने लगे "आखिर कब तक मैं इन अंधे बूढे माता पिता को धोता फिरूँगा, मेरी अपनी भी तो ज़िन्दगी है, इन्हें छोड़ कर वापस लौट जाऊँगा और विवाह कर अपना घर बसाऊंगा और सुखी जीवन जिऊंगा, ऐसा करता हूँ इस नदी में ही इन्हें डुबो देता हूँ, नही नही ऐसा करता हूँ जगंल में ही छोड़ देता हूँ और अपने नगर लौट जाता हूँ",
इसी उधेड़बुन में ही उसकी आँख खुल गयी और वो अपने माता पिता के पास गया ये कहने की वो अब उनको नही और ढो सकता है इसलिए उन्हें इसी वन में छोड़ कर नगर लौट जाएगा विवाह कर घर बसाएगा।
माता पिता ने धैर्य पूर्वक उसकी बात सुनी और कहा "पुत्र जैसी तुम्हारी इच्छा, पर आखिरी बार ये नदी तो पार करवा दो",
श्रवण ने सोचा चलो एक आखिरी बार ये कार्य भी कर ही देता हूँ, और वो नदी पार करवाने लगे, जैसे जैसे वो नदी में बढ़ने लगे ह्रदय परिवर्तन होने लगा, सोचने लगे "मेरे माता पिता का मेरे अतिरिक्त कौन है, मेरा भी उनके अतिरिक्त कौन है, ये तो मेरा संसार है, इनकी सेवा ही मेरा कर्तव्य है, इनकी सेवा ही ईश्वर की सेवा है, हे प्रभु कैसे बुरे ख्याल दिलमे आ गए थे मेरे, स्वार्थवश मैंने माता पिता का अहित सोचा",
इस बीच नदी पार हो चुकी थी, दुःख के कारण श्रवण कुमार माता पिता के समझ रो रहे थे, छमा मांगते हुए अपनी गलती की व्याख्या कर रहे थे, तभी माता पिता बोले "पुत्र मत रो, इसमें गलती तुम्हारी नही उस भूमि की है जहाँ तुम रुके थे, अनेक राक्षस व् बुरे लोग उस धरती पर पाप कर्म करते आये है, इसलिए वो भूमि अपवित्र है,इसलिए इसने तुम्हारे मन में भी पापी विचार भर दिए किंतु ये नदी साधू संत व् ऋषि मुनियो के पूजन व् स्नान के कारन पवित्र है, तभी हमने तुमसे नदी पार कराने को कहा ताकि तुम्हारे अंदर उपजे पाप धूल सके और वही हुआ,
माता पिता की बात सुन कर श्रवण कुमार का विलाप बन्द हुआ और उन्हें यात्रा पर वो ले गए।
Just now

गीत-"तू ही ज़िन्दगी है......."

"तू ही ज़िन्दगी है, तू जीने की वजह है,
देखु मैं जहाँ भी, तू ही हर जगह है-२

दूर तुझसे हो कर, क्यों मैं दूर नही हूँ,
जुदा तुझसे हो कर, जुदा तुझसे नही हूँ,

है ये कैसी लगन, जुड़ा तुझसे हर कही हूँ,
हूँ तेरा दीवाना, तू देख मैं वही हूँ,

लेता हूँ, तेरा ही नाम रब से पहले
ऐ मेरे हमनशीं, तू ही तो मेरी बन्दगी है,

तू ही ज़िन्दगी है...........................

शामो-सुबह बस, तुझे ही पुकारता हूँ
हर घडी मैं तो, तेरी ही राह देखता हूँ,

बंजर सी ज़िन्दगी में, बहार तुम लायी हो
किस्मत से मुझे तुम, यार मिल पायी हो-२,

तनहा थी ज़िन्दगी मेरी, ऐ मेरे हमदम
तुमसे मिली हर ख़ुशी, ऐ मेरे सनम,

तेरी ही चाहत के, जादू का असर है
तुझमें ही बसती, मेरी जान हर पहर है-२

है कितनी भोली, तेरी ये सूरत
है मासूम सी अदा, और कितनी सादगी है,


तू ही ज़िन्दगी है, तू जीने की वजह है,
देखु मैं जहाँ भी, तू ही हर जगह है--४"


--
Thanks and Regards
   *****Archu*****

Tuesday, 20 June 2017

मुक्तक

"आज भी उसकी बेवफाई याद आती है
रह-रह कर उसकी रुसवाई याद आती है
जिसके लिये खुद को कभी भुला बैठे थे 
उस बेवफा के लिए वफाई याद आती है"

"सता कर सदा मुझे कैसे हस्ता रहा है वो
रुला कर सदा मुझे खुश होता रहा है वो
कैसे अपना ये सदा दर्द छिपाते रहे हम
मरते यु हम रहे और कैसे जीता रहा है वो"

Sunday, 18 June 2017

ईश्वर वाणी-216, ईश्वर का क्रोध, प्राकतिक विपत्ति आदि

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों अधिकतर तुमने प्राकृतिक आपदा, दुःख, कष्ट, विपत्ति के समय लोगों से सुना होगा अथवा कहा भी होगा की ईश्वर अथवा भगवान के नाराज़ होने पर ऐसा हुआ।

किंतु आज मैं तुम्हें बताता हूँ मैं तुमसे कभी नाराज़ नहीं होता, यदि मैं तुमसे नाराज़ ऐसे ही होता रहता तो अब तक तुम्हारा अस्तित्व रहता क्या??

हे मनुष्यों जाती, धर्म, सम्प्रदाय के नाम पर मेरे आराधनालय को तुम नष्ट करते हो, मेरी प्रतीकात्मक प्रतिमाओ को नष्ट करते हो, मेरे बताये वचनो की पुस्तको को नष्ट करते हो, झूठी परम्परा के नाम पर निरीहों कि हत्या करते हो, अपने स्वाद जीभ के पूर्ण करने हेतु जाने कितने ही मासूम जीव जन्तुओ को मौत के घाट असमय ही उतार देते हो, लोगो से छल करते हो, झूठ बोलते हो, बुरी नज़र रखते हो, चोरी डकैती करते हो,व्यभिचार करते हो,भ्रष्टाचार करते हो, देश द्रोह करते हो, रिश्तों का सम्मान नही करते, स्वार्थ पूर्ती में लगे रहते हो, सदा पाप कर्म में लीन रहते हो।
इन सब बातो के आधार पर तुमसे क्रुद्ध हो कर मैं समस्त मानव जाती का ही विनाश कर दूंगा जैसा की तुम कहते हो।

हे मनुष्यों ये न भूलो तुम्हारी आत्मा के जन्म से ले कर अनंत काल तक सब कुछ तुम्हारे विषय में लिखा जा चूका है, तुम्हारे कष्ट, तुम्हारी ख़ुशी, तुम्हारे कर्म, तुम्हारी सोच, सब कुछ पहले ही लिखा जा चूका है।

यदि कोई दुर्घटना या किसी भी प्रकार की विपत्ति तुम पर आती है तो वो भी लिखी गयी है तुम्हारे जन्म से पूर्व ही, साथ ही पिछले जन्मो और इस जन्म के तुम्हारे कर्म अनुसार तुम्हे मिलने वाला ये एक दंड मात्र है जो पहले ही लिखा जा चूका है।

इसलिये ये न सोचो की कोई दुर्घटना या विपत्ति मेरे क्रोध के कारण तुम्हारी ज़िन्दगी में आई है, क्योंकि इन्हें तो आना ही था इसलिये ये तुम्हारी ज़िन्दगी में आयी।

हे मनुष्यों मेरी अथवा मेरे किसी भी अंश की तुम पूजा करते हो भक्ति करते हो, तुम्हे उसका प्रतिफल भी मिलता है, तुम्हारी प्राथना पूर्ण होती है, ये सब पहले ही लिखा जा चूका है।

तुम इस श्रष्टि रुपी रंगमंच पर केवल अपना किरदार निभाते हो, किंतु इसका मालिक मैं हूँ, इस श्रष्टि रुपी नाटक का लेखक भी मैं हूँ, संचालक भी मैं, निर्माता भी मैं हूँ, तुम सिर्फ एक कलाकार हो जो अपना किरदार निभा कर चले जाते हो फिर नाटक में भाग लेने।

इसलिये मैं कभी किसी पर क्रोधित नही होता, तुम सब मेरे समझ एक अबोध बालक समान हो, जैसे एक बालक को पता नही गलत और सही, उसकी कई बार की गयी नासमझी की गलतियों को माता पिता नासमझ कह कर भुला देते है, न की छोटी छोटी हर गलती पर दण्डित करते है, वैसे ही तुम सब मेरे लिये उस अबोध बालक समान हो, मैं तुम्हारा पिता ईश्वर हूँ।

कल्याण हो


**अर्चना मिश्रा**







Friday, 16 June 2017

ईश्वर वाणी-215, भौतिक माता पिता व् भौतिक रिश्ते



ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों जिस परिवार में तुमने जन्म लिया है, जिन माता-पिता की कृपा से तुमने भौतिक देह पायी है यद्धपि तुमसे वो बुरा से बुरा अथवा अच्छा व्यवहार करे किंतु तुम्हें केवल सत्य का अनुशरण कर उनका सम्मान करना है, जब भी जहाँ भी उन्हें तुम्हारी आवश्यकता हो तुम्हें उनकी सहायता करनी बिना ये सोचे की उन्होंने तुम्हारे साथ क्या और कैसा व्यवहार किया।


हे मनुष्यों ये न भूलो की तुम्हारे सूक्ष्म शरीर तुम्हारी आत्मा का जन्म दाता मैं ही हूँ, मैं ही माता और पिता तुम्हारी आत्मा का हूँ, मेरे लिये तुम न स्त्री हो न पुरुष हो, मेरे लिये तुम सिर्फ एक आत्मा हो, तभी मैं तुम्हारे साथ कोई और किसी भी प्रकार का भेद भाव नहीं करता, किंतु तुम्हारे भौतिक माता पिता तुम्हारे भौतिक स्वरुप के अनुसार व्यवहार करते है, समाज की अनेक परम्परा को अपना कर कई बार तुम्हें अन्तर्मन तक चोट पहुचाते है, किंतु मैं फिर भी ये नहीं कहता की तुम भी उनके साथ ऐसा ही करो, यदि तुम ऐसा करते हो तो तुममे और उनमे कोई भेद नही होगा।


हे मनुष्यों जो तुम्हारे आज भौतिक माता पिता है पिछले जन्म में वो तुम्हारी अपनी संतान भी हो सकते है, मित्र व् बंधू भी हो सकते है,जो तुम्हारा रिश्ता तुम्हारे भौतिक माता पिता से आज है संभव हैं अगले जन्म में न हो, संभव है फिर कई जन्मों तक तुम एक दूसरे से न मिलो।


हे मनुष्यों ये न भूलो जैसे कर्म तुम आज करते हो उसका फल युगों तक पाते हो, इसलिये भले तुम्हारे भौतिक माता पिता तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार करे, किंतु जब भी उन्हें तुम्हारी आवश्यकता हो बिना झिझके उनके काम आओ, साथ ही ये बात भी याद रखो ये केवल भौतिक माता पिता है, भौतिक रिश्ते तो दुखदायी होते ही है किंतु इसका अर्थ ये नहीं की जिसने तुम्हे दुःख पहुचाया उसे इससे भी अधिक कष्ट दो, उसकी आवश्यकता पर मुह मोड़ लो, उसे अकेला छोड़ दो।


हे मनुष्यों आदि काल से ले कर अनंत काल तक तुम्हारी आत्मा का जनक मैं ही हूँ, मैं ही वस्त्विक माता व् पिता हूँ,  मैं ही देह रुपी वस्त्र तुम्हे पहनने को देता हूँ, देह एक भौतिक वस्तु है इसलिये एक निश्चित समय के साथ नष्ट हो जाती है फिर दूसरा वस्त्र धारण करती है, किंतु इस बीच अनेक भौतिक रिश्ते और नाते बना अनेक सुख व् दुःख प्राप्त करती है, ये दुःख व् सुख सभी स्थायी नही होते क्योंकि ये भौतिकवाद से बने होते है, और जो भौतिक नही है वो है आत्मा और सच्चा रिश्ता है जो सिर्फ सुख की अनुभूति देता है वो है ईश्वर और आत्मा का सच्चा रिश्ता।


हे मनुष्यों मैं ये नही कहता की अपने भौतिक रिश्तों को भुला कर संन्यास धारण कर सदा मेरी ही भक्ति करो, तुम सिर्फ इतना करो कोई तुम्हारे साथ अच्छा या बुरा व्यवहार करे किंतु तुम कटुता त्याग सदा मानव पथ पर चल सत्मार्ग का अनुसरण करो, किसी के प्रति बेर भाव न रख कर जो भी व्यक्ति तुमसे सहायता माँगे उसकी सहायता करो बिना इसकी इच्छा किये की वो तुम्हारी भी कभी सहायता करेगा या काम आयेगा, हो सकता है शैतान के वशिभूत तुम्हे वो तुम्हारे उपकार के बदले नुक्सान पहुचाये किंतु तुम बेर न रखते हुए सत्मार्ग पर चलो और भौतिक रिश्ते पर ध्यान न देते हुए आत्मा और ईश्वर के पवित्र रिश्तों की सत्य मान कर नेक कर्म करते रहो, तुम्हारा कल्याण होगा।"



कल्याण हो

Thursday, 15 June 2017

ईश्वर वाणी-214, ईश्वर का साकार व निराकार स्वरूप

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यद्धपि संसार में अनेक लोग मेरे भौतिक स्वरुप अर्थात मूर्ती पूजक है और वही अनेक लोग मेरे निराकार स्वरुप के अनुयायी है, किंतु जो लोग मेरे भौतिक स्वरुप की निंदा करते और उसे मानने वाले को हेय दृष्टि से देखते है आज उन्हें मैं कुछ जानकारी अवश्य देना चाहता हूँ।

देश, काल, परितिथि के अनुरूप मैं ही अपने एक अंश को भौतिक रूप धारण कर धरती पर भेजता हूँ, वही मानवता की हानि रोकने हेतु ज्ञान का पुनः प्रचार प्रसार करते ताकि जो व्यक्ती मेरे ज्ञान और बातो को भूल गए है पुनः उन्हें सत्य का ज्ञान हो और सत्मार्ग का अनुसरण वो करे।

हे मनुष्यों जहाँ जहाँ मानव केवल मेरे भौतिक स्वरुप पर विश्वास कर मेरी सत्ता को चुनोती दे कर जगत व् प्राणी जाती का दोहन व् शोषण  लगा वहा वहा मेरे ही एक अंश ने वहा जन्म ले कर एकेश्वरवाद की नीव रख ये सन्देश दिया की ईश्वर एक है, वो केवल भौतिक स्वरुप मूर्ती आदि में तथा मंदिर मैं नहीं अपितु समस्त जगत में है, अतः मानव को केवल उस मूर्ती की पूजा नहीं करनी चाहिये जो नाशवान है, बल्कि निराकार आदि अनंत ईश्वर की अरांधना व् पूजा करनी चाहिये उसी के समस्त मश्तक झुकना चाहिये क्योंकि वो ही परम सत्य है।

वही जहाँ मानव निराकार ईश्वर पर विश्वास कर जगत व् प्राणी जाती का दोहन करते हुये मेरी सत्ता को चुनोती देने लगे, ।मैंने ही अपने एक अंश को भेजा वहा, उन्होंने जगत व् प्राणी जाती की रक्षा हेतु कभी युद्ध किया तो कभी मानवता के प्रचार हेतु उपदेश दिए, मानव में बुराई के बीज न पनपे तथा सदा बुराई के प्रति वो दहसत में रह कर सत्मार्ग पर ही चले इसलिये मूर्ती पूजा का प्रचलन वहा किया, ताकि मूर्ती जो भले एक कलाकार की एक कल्पना मात्र है जब भी मनुष्य उसे देखे तो पाप कर्मो से भय खाते हुये मेरी ही शरण में आये।

हे मनुष्यों यधपि तुम मेरे साकार और मूर्ती स्वरूप पर यकीं करो या निराकार रूप पर, तुम जिस पर भी विश्वास कर मेरे बताये मानव पथ पर यदि चलोगे तो निश्चित ही मुझे प्राप्त करोगे किंतु अपनी विचारधारा मेरे साकार व् निराकार रूप की एक दूसरे पर धोपोगे व् एक दूसरे का उपहास करोगे नुक्सान पहुँचाओगे तो निश्चित ही मेरे क्रोध के पात्र बनोगे, क्योंकि साकार व् निराकार दोनों ही स्वरुप तुम्हे मुझ तक पहुचाने का ही एक मार्ग मात्र है, मैं ईश्वर हूँ।

कल्याण हो




ईश्वर वानी-213, प्रकति और पुरुष

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यद्दपि संसार की और जीवो की उत्पत्ति के विषय में अनेक जानकारी मैं तुम्हें दे चूका हूँ, किंतु आज इसी श्रेढ़ी में और अधिक जानकारी तुम्हें बताता हूँ।

श्रष्टि की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारक प्रकति और पुरुष का मिलन है जिनके सहयोग से ही समस्त श्रष्टि का निर्माण हुआ है, इसी प्रकति को कोई आदि शक्ति कहता तो कोई जगत माता जगदम्बा, वही पुरुष जिसे कोई परम पिता ब्रह्माँ कहता है तो कोई परमेश्वर।

हे मनुष्यों मैंने ही जगत की उत्पत्ति हेतु सर्व प्रथम इनकी रचना की जिनके सहयोग से समस्त ब्रमांड का निर्माण हुआ तत्पश्चात पृथ्वी पर जीवन हेतु ये ही अति सूक्ष्म रूप धारण कर धरती पर आये और यहाँ जीवन की नीव रखी।

हे मनुष्यों ये प्रकति और पुरुष आदि समय से ब्रमांड में अदृश्य रूप से विराजित है और अनन्त समय तक रहेंगे, मेरे द्वारा इनका जन्म हुआ इसलिये इनमे मेरे समान ही शक्तिया है, देश, काल, परिस्तिथि के अनुरूप मेरी ही आज्ञा प्राप्त कर ये धरती पर भौतिक रूप प्राप्त करते है मानवता की हानि रोक फिर से मानवता की नीव रखते है।

यहाँ ये बात अवश्य जानने योग्य है अलग होते हुये भी प्रकति और पुरुष एक ही है, अपने निर्धारित उद्देश्य पूर्ण कर ये एक हो कर मुझमे ही विलीन हो जाते है, मैं एक विशाल अनंत सागर हूँ और ये उस सागर की एक बूँद, मैं ईश्वर हूँ ।

कल्यान हो

Tuesday, 30 May 2017

ईश्वर वाणी-212, मानव देह

ईश्वर कहते कहते हैं, "हे मनुष्यों प्राणियो के लिये जल बेहद महत्वपूर्ण
है, इसी जल तत्व के कारण ही जीव भौतिक देह धारण कर धरती लोक पर आया, ये
ही जल तत्व पूरी सृष्टि के निर्माण व् जीवन  का आधार बना।
हे मनुष्यों यदि तुम्हारे शरीर जिसमे सत्तर प्रतिशत से अधिक जल तत्व
मैजूद है, यदि कम होता है तो धीरे धीरे अनेक बीमारियों को निमंत्रण देता
है ये निमंत्रण एक चेतावनी होती है तुम्हारे लिये ताकि तुम चेत जाओ और
अपनी देह का ध्यान रखो।
हे मनुष्यों जैसे एक 'गाडी' को चलने के लिए ड्राईवर की, ईधन की, पानी की
आवश्यकता होती है वैसे है ही शरीर रुपी गाडी के लिए आत्मा रुपी चालाक,
भोजन रुपी ईधन तथा जल की आवश्यकता होती है।
यदि गाडी में ईधन व् चालक तो है पर पानी कम होता गया फिर धीरे धीरे इसका
इंजन बंद हो कर रुक जाता है वैसे ही ये भौतिक देह है, अगर भोजन व् आत्मा
तो है इसमें लेकिन जल की कमी (चाहे रक्त रूप में अथवा जल रूपमे) तब भी ये
देह धीरे धीरे कार्य करना बंद कर देती है और अंत को प्राप्त होती है।
हे मनुष्यों ये न भूलो की ये देह एक गाडी के समान ही है और तुम्हें
तुम्हारे उद्देश्य हेतु मेरा दिया गया एक उपहार है, तुम्हारी आत्मा देह
रुपी गाडी में यात्रा कर प्राणी व् जगत का कल्याण करने हेतु ही यहाँ आई
है, अतः इसे व्यर्थ के कार्य व् पाप कर्मो में मत लगाओ, अपने कर्म पहचानो
और उसमे जीवन लगाओ।

हे मनुष्यों पृथ्वी पर आधे से अधिक स्थान पर समंदर मौज़ूद है, यदि इसका जल धीरे धीरे कम होने लगे तो पृथ्वी पर कैसा विशाल संकट आ जायेगा??

जल की उपयोगिता न सिर्फ तुम्हारी देह के लिए अपितु पूरी श्रष्टी के लिये आवश्यक है।

आकाशीय दिव्य सागर जिससे समस्त ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है, यदि इन भौतिक आँखों से कोई उन्हें देख सकता, छु सकता तो निःसंदेह मानव उसे नुक्सान पहुचाने का प्रयत्न करता, इसलिये जितने तारे व् गृह नक्षत्र नही है इससे विशाल है ये सागर जो सब कुछ अपने हाथो में संभाले हुये है और मानव जाती के लिये एक प्रतिरूप अथवा झांकी समस्त ब्रह्माण्ड की यहाँ दिए हुए है, ताकि मानव उसका अध्ध्यन कर कुछ ज्ञान ब्रह्माण्ड का प्राप्त कर सके

हे मनुष्यों वो अनंत अजन्मा अविनाशी सागरो का महासागर मैं ही हूँ मैं ईश्वर हूँ।"

कल्याण हो

Thursday, 25 May 2017

गीत-दिलमे है हिंदुस्तान

"है खूबसूरती बिखरी जहाँ प्यार का है आसमान
दुनिया में कितना हसीं है हमारा ये भारत महान

दुनिया में मिलती है इसी से ही हमको तो पहचान
रहे चाहे जहाँ भी लेते सदा है इसी का ही नाम

रहता हमेशा जो दिलमे नाम है उसका ही हिन्दुस्तान
दिल में है हिन्दुस्तान जान मेरी हिंदुस्तान-२

चारो दिशाओं में मिलते है जहाँ ईश्वर के ही निशाँ
वो मुल्क हमारा हिंदुस्तान जान से प्यारा हिंदुस्तान

लुटादे हस्ते हुये अपनी हस्ती भी जिसके लिये
इसी मिट्ठी में भगत सिंह वीर भी पैदा हुये

इसकी आज़ादी के लिये जाने कितने शहीद है हुये
कितनो दी है यहाँ अपनी जान

दिल में है हिन्दुस्तान जान मेरी हिंदुस्तान-२

न मिटने देंगे वज़ूद इसका न टूटने देंगे इसको हम
बहुत तोड़ दिया देश अपना बता के जाती और धरम


दुनिया के इतिहास में नाम है जिसका बेहद पुराना
देखि है कितनी दुनिया और कतना ज़माना

हर कोई सुनाता है इसकी ही दास्तान
करता नहीं है भेद यहाँ किसी से कोई

है सब बराबर है सभी यहाँ तो समान
करती है दुनिया जिसको तो प्रनाम

दिल में है हिन्दुस्तान जान मेरी हिंदुस्तान-२

है खूबसूरती बिखरी जहाँ प्यार का है आसमान
दुनिया में कितना हसीं है हमारा ये भारत महान

दुनिया में मिलती है इसी से ही हमको तो पहचान
रहे चाहे जहाँ भी लेते सदा है इसी का ही नाम

रहता हमेशा जो दिलमे नाम है उसका ही हिन्दुस्तान
दिल में है हिन्दुस्तान जान मेरी हिंदुस्तान-4"

Wednesday, 24 May 2017

ईश्वर वाणी-२०११, ईश्वर की मृत्यु

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों मैं आत्माओं में परम हूँ इसलिये परमात्मा हूँ, अजन्मा और अविनाशी हूँ अर्थात न तो मेरा जन्म हुआ है न ही मेरी मृत्यु होती है, मैं ही 'कल', 'आज', 'कल' अर्थात काल हूँ।

मैं ही जीवों में प्रथम हूँ, ध्वनियों में प्रथम, विचार में प्रथम, संसार में प्रथम हूँ। हे मनुष्यों सतयुग से ले कर कलयुग में इस काल तक देश, काल, परिस्तिथि के अनुरूप अपने ही एक अंश को धरती पर भेजा जब जब जहाँ जहाँ मानवता की हानि हुई।

हे मनुष्यों मैं एक विशाल सागर हूँ, समस्त सृष्टि मुझमे ही समायी है किंतु जब जब मानवता की हानि और जीवो का दोहन शोषण व् अत्याचार मानव दवारा होता है, ये सभी सीमाये जब तोड़ देता है तब मुझ विशाल सागर से ही एक बूँद जो मेरे ही समान श्रेष्ट है क्योंकि वो मेरा ही एक रूप है अर्थात वो स्वम में ही हूँ देश, काल, परितिथि के अनुरूप जन्म लेता हूँ।

हे मनुष्यों मैं जन्म अवश्य लेता हूँ, लीला पूर्ण कर देह त्यागने तक का स्वांग में करता हूँ ताकि तुम भी इस भौतिक काया के मोह में न पड़ो और ये जान सको की जब ये भौतिक देह किसी 'अवतारी' की नही रही तो तुम्हारी सदा कैसे हो सकती है, सच्चा केवल मेरा नाम बाकी तो माया है।

हे मनुष्यों किंतु मेरा जन्म तुमने देखा सुना होगा किंतु मेरे मृत शरीर के विषय में न सोचा होगा न देखा होगा न जाना होगा,
जैसे जन साधारण की मृत्यु के बाद उसका क्रिया कर्म किया जाता है मोक्ष के लिए वैसे मेरा नही होता, यहाँ तक की मेरी मृत देह भी किसी को प्राप्त नही होती, कारन आज तुम्हे बताता हूँ।

हे मनुष्यों मैं ही आत्माओ को जन्म व् मुक्ति देता हूँ तो भला मेरी भौतिक देह का अंतिम संस्कार कर मुझे कैसा मोक्ष, ये तो वही बात हो गयी जैसे तुम अपने घर में रह रहे हो, जरूरत मन्दो को पनाह दे रहे हो और कोई तुम्हे तुम्हारे ही घर में पनाह देने की बात कहे।

हे मनुष्यों साथ ही आत्माओं में परम होने के कारन मैं परमात्मा जो भी भौतिक देह धारण करता हूँ वो भी उतनी ही पावन होती जितनी उस देह में विराजित आत्मा, अतः कोई भी मानव उसे नहीं प्राप्त कर सकता तथा समस्त संसार का स्वामी मैं, सबका मुक्ति दाता मैं, मोक्ष प्रदान करने वाला मैं, मेरा अंतिम संस्कार नही किया जाता,कोई करना भी चाहे तो नही होता क्योंकि सभी आत्माओ का स्वामी आत्माओ में परम अजन्मा, अनन्त, अविनाशी मैं ईश्वर मेरी मृत्यु नहीं होती।"


कल्याण हो


Sunday, 21 May 2017

गीत-चुरा ले गया दिल

"चुरा ले गया दिल मेरा तेरा ये भोलापन
फिर भी चाहे बस तुझको ही मेरा मन-2

क्यों लगे है मुझे तू अपना
है हकीकत या है एक सपना-२

तेरी सादगी ही ने दिल मेरा है चुराया
लाखो है हंसी यहाँ पर दिलमे तू ही आया-२

दुनिया की भीड़ में तनहा मैं रहता हूँ
बिन तेरे कितना अकेला मैं होता हूँ

चुरा ले गया....................................

सुनाई देती है आवाज़ तेरी पायल की खन खन
कर गयी दीवाना हाय ये तो बस मेरा मन-2

अपने मिलन की आस दिलमे जगाये हुए हूँ
तेरी ही एक तस्वीर बस दिलमे बसाये हुए हूँ

कभी तो होगा मिलन भी यहाँ अपना
पूरा होगा अरमान और हर एक सपना-२

अधूरी सी लगती है अब ये ज़िन्दगी मेरी
आजा गले लग जा मेरे ओ जानेमन

चुरा ले गया.............................


ना होना जुदा मुझसे अब कभी तुम
बन गयी हो अब मेरी ज़िन्दगी तुम

दिल दिया है तुम्हे तुमको ही चाहा
हर लम्हा तुझको ही मैंने तो चाहा

मासूम सा चेहरा ये तेरा
तेरी हर ये भोली अदा-२

बस इसे ही देख कर मैं
हो गया हूँ तुम पर फ़िदा-२

मिलते बहुत है मुझे लोग जहाँ में
पर तुझसे मिलकर ही लगे है अपनापन

चुरा ले गया दिल मेरा तेरा ये भोलापन
फिर भी चाहे बस तुझको ही मेरा मन-४"
--
Thanks and Regards
*****Archu*****

गीत-धीरे धीरे से........


"धीरे धीरे से मेरे दिलमे तुम आई हो
होले होले से दिलमे तुम समायी हो-२

होता है प्यार क्या तुमसे मिल कर ही मैंने जाना
जाने कैसे बन गया मैं तेरा दीवाना-2

धीरे धीरे से.................................

अधूरी सी ज़िन्दगी थी मेरी अब से पहले
बहार बन कर इसमें तुम ही बस आई हो

सोचता रहता हूँ अब तुमको ही हर पल
चाहता हूँ कितना तुमको ही में पल पल

धीरे धीरे से.........................................

सुना था बहुत नाम मैंने भी आशिकी का
सुना था बहुत नाम मैंने भी दिल्लगी का-2

बन कर  हर 'ख़ुशी' मेरी ज़िन्दगी में आयी हो
'मीठी' बातो से ही दिलमे तुम मेरे हाँ छाई हो

हो गयी है मोहब्बत अब तुमसे इतनी
पलकों को आँखो है से ऐ हमदम जितनी-२

वीरान सी ज़िन्दगी थी तुमसे पहले
दूर थी लबो से हँसी भी तुमसे पहले
धीरे धीरे से दिलमे तुम ही समाई हो-२

धीरे धीरे से मेरे दिलमे तुम आई हो
होले होले से दिलमे तुम समायी हो-4"
--
Thanks and Regards
*****Archu*****

Friday, 19 May 2017

ईश्वर वाणी-२१०, ईश्वर के रूपों का महत्त्व

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यु तो मैं निराकार और अजन्मा हूँ, न तो
मेरा आदि न अंत है, मैं एक विशाल सागर हूँ, मैं ही मृत्यु लोक अर्थात
धरती पर विशाल सागर से एक बूँद को भेज कर लीला करता हूँ।
हे मनुष्यों यु तो मैं एक ही हूँ किंतु देश, काल, परिस्तिथि के अनुरूप
मुझे अथवा मेरे ही एक अंश को धरती पर जन्म लेना पड़ता है, समय समय पर मानव
सभ्यता में जो बुराई उत्पन्न होती है उन्हें दूर करने हेतु लीलावश यहाँ
आना ही पड़ता है।
कही मेरे किसी रूप पर विशेष पुष्प चढ़ाना वर्जित है तो कही विशेष जल से
अभिषेक करना, कही स्त्रियों पर अनेक पाबन्दी है और विशेष नियम है उनके
लिये तो कही पूजनीय।
सभी स्त्री-पुरुष को समान अवस्था व् समान रूप से मेरी पूजा व् मुझे याद
करने हेतु ही साथ ही मेरे किसी रूप को कभी कुछ वर्जित कभी कुछ वर्जित इन
सब में समानता लाने हेतु ही मैं अपने विशाल सागर से एक बूँद धरती पर देश,
काल, परिस्तिथि के अनुसार भेजता हूँ ताकि सभी को मुझे प्रत्येक अवस्था
में प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हो, कोई भी मनुष्य किन्ही कारणों से
मुझे प्राप्त करने वंचित न रह जाये, यद्धपि बुराई और छल के मार्ग पर चलने
वाला मुझे नही पा सकता, किंतु जहाँ कुछ लोगों ने विशेष परिस्तिथि में
मेरा नाम जपने पर भी मनाही है, उसी दोष को दूर करने हेतु ही मैंने अपने
अंश को धरती पर भेजा ताकि कोई कभी मेरे नाम से किसी भी परिस्तिथि में
वंचित न रह जाये, किसी का भी शोषण मेरे नाम पर न हो अपितु सभी को बराबर
मेरी पूजा व् स्तुति का अवसर प्राप्त हो।"
कल्याण हो

Thursday, 18 May 2017

ईश्वर वाणी-209, मानव देह एक मंदिर

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों ये तुम्हारी देह है ये एक मंदिर के समान है, तुम्हारी आत्मा उस मंदिर में विराजित भगवान के समान है, जब तुम अपने कर्मो से इस मंदिर को दूषित कर्ते हो तो अंदर बेठी ईश्वर रुपी आत्मा तुम्हें ऐसा करने से रोकती है किंतु स्वार्थ में अंधे तुम उसकी नही सुनते और इस देह रुपी मंदिर को मैला ऐसा कर देते हो की फिर ये पवित्र और साफ़-स्वच्छ नही हो पाता।

हे मनुष्यों जैसे बाहर के मंदिर रूपी भवन को समय समय पर देखभाल की आवश्यकता होती है, अंदर देखा जाता है की मंदिर की मूरत खंडित तो नही हो गयी,अगर हुई है तो दूसरी लगाई जाती है, वैसे ही तुम्हारी देह रुपी इमारत है, इसे अनेक कर्म करने पड़ते है, पर समय समय पर ध्यान देते रहो की कही कोई पाप कर्म न हो जाए, अगर मलिनता कहि आ रही है तो वही रुक जाओ और और इमारत को ठीक करो, समय समय पर ह्रदय में विराजित अंर्तआत्मा का निरीक्षण करो कही वो दूषित हो कर खंडित तो नहीं हो गयी, यदि वो खंडित हो गयी है,पाप कर्म में लग गयी है तो सुधारो अपने कर्म, आत्मा को दूषित होने से बचाओ, ये भौतिक मूरत नही जो बदली जाये इसलिये श्रेष्ट कर्म करो ताकि ये देह रुपी मन्दिर व् आत्मा रुपी भगवान सदा इसमें स्थापित रहे, जगत का कल्याण करे।"



कल्याण हो

ईश्वर वाणी-२०८, ईश्वर को कष्ट

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यदि तुम संसार में किसी भी जीव से घृणा करते हो, किसी भी जीव का तिरस्कार करते हो तो तुम मेरा भी अनादर करते हो, मेरा भी तिरस्कार करते हो।

हे मनुष्यों ये न भूलो समस्त संसार व् समस्त जीव मैंने ही बनाये है, सभी से मुझे समान प्रेम है, ऐसे में यदि किसी को तुम कष्ट देते हो तो तुम मुझे कष्ट देते हो।

माता-पिता की  चाहे दस संतान हो, कोई बहुत सुन्दर, कोई कम सुन्दर, कोई असुंदर, कोई विकलांग, कोई मन्द बुद्धि, कोई तेज़ तो कोई सीधा, माता-पिता तो सभी से ही समान प्रेम भाव रखते है, किंतु यदि कोई उनके बालक जो असुंदर, मंद बुद्धि, सीधा है उसको अपमानित करे, उसका तिरस्कार करे, भले ऐसा करने वाले माता-पिता के सुंदर बालकों में से ही कोई एक हो, माता-पिता को कष्ट तो होगा ही, और माता-पिता के समझाने पर भी उन्हें अगर समझ न आये तो वो उन्हें दंड भी देते है।

हे मनुष्यों वैसे ही अगर तुम मेरे किसी बालक (प्रत्येक जीव) को कष्ट देते हो, घृणा करते हो, नुक्सान पहुचाते हो तो निश्चित ही मेरी रचना का उपहास करते हो और इसके लिये दंड के भागी बनते हो"।

कल्याण हो


ईश्वर वाणी-207, मानव धर्म

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों तुम जिस धर्म की बात करते हो, जिसके नाम पर तुम आपस में लड़ते हो, जिस धार्मिक पुस्तक व् ग्रन्थ की बातो पर तुम मुझे श्रेष्ठ कहते हो, ये तो एक मत अर्थात विचारधारा है जो तुम्हे मुझसे जोड़ती है।

अनेक विचारधारा जो धरती पर है, जिनपर तुम चलने का दावा करते हो, धार्मिक ग्रन्थ व् उनकी बाते करते हो, ये सब तो तुम्हें मुझ तक पहुचाने मात्र का मार्ग है।

हे मनुष्यों मैंने कोई ऐसा धर्म नही बनाया जिसके कारण तुम आपस में बेर भाव रखो, मानव ही नहीं अन्य जीवो को सताओ, मैंने श्रष्टि की शुरुआत में ही तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म व् तुम्हारा धर्म निश्चित किया था, तुम्हारे कर्म समस्त पृथ्वी व् उसके जीवो जी रक्षा करना, प्रकति व् प्राणी जाती की रक्षा कर उनके कल्याण हेतु कार्य करना, व् धर्म था मानव जाती की स्थापना।

हे मनुष्यों यु तो मैं निराकार हूँ किन्तु तुम्हारा मुझपर विश्वास बना रहे इसलिये जब जब जहाँ जहाँ मानवता की हानि होती है मुझे मानव देह लेनी ही पड़ती है, देश, काल, परिस्तिथि, भाषा, सभ्यता, संस्करती के आधार पर तुम मुझे अनेक नाम दे डालते हो, तुम्हारे अंदर अमानवीये बुराई का नाश कर एक सम्पूर्ण मानव बनाने हेतु ही मैं अपने एक अंश को धरती पर भेजता हूँ जो तुम्हे मुझ तक आने का रास्ता दिखा कई वचन कहता है, जिनपर तुम यदि चलते हो तो मुझ तक पहुचते हो।

हे मनुष्यों इसका कदापि ये अर्थ नही मेरे अंश द्वारा जो बाते तुम्हे बताई उन्ही के द्वारा तुममुझे प्राप्तकर सकोगे, तुम अपनी प्राचीन मान्यता से भी मुझे प्राप्त कर सकते हो किंतु अपने अमानवीये अवगुणों का नाश कर के।

हे मनुष्यों इसलिये धर्म के नाम पर झगड़ा मत करो,ये न भूलो मैं एक विशाल सागर हूँ जिसका कोई शिरा नही, जितने भी तुम धार्मिक ग्रन्थ पड़ते हो, खुद को मुझे जानने का दावा करते हो ये तो उस सागर की एक बून्द के बराबर नही है, समस्त संसार के समस्त ग्रन्थ तुम्हें मुझे जानने की थोड़ी जानकारी व् ज्ञान अवश्य देते है किंतु पूर्ण नही, पूर्ण ज्ञान तो इतना है की चारो युग और अनंत जन्म भी कम पड़ जाये।

हे मनुष्यों इसलिये सभी मतानुयायी का सम्मान करो , सभी धर्म अर्थात विचारधारा पर चल उनका सम्मान कर, समस्त धार्मिक ग्रंथो की बातो पर चल उनका अनुशरण कर के ही तब तुम एक श्रेष्ट मानव बन मानव धर्म की स्थापना कर सही  मायने में मेरे बनाये धर्म पर चल मुझे प्राप्त कर पाओगे।।"

कल्याण हो

Tuesday, 25 April 2017

ईश्वर वाणी-२०६, ईश्वर की दिव्य किरणे

ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यद्धपि मेरा वास्तविक रूप निराकार है, किंतु सदियो से तुम जिन्हें देवी-देवता कह पूजते आ रहे हो वो मेरा ही एक अंश है।

मैं एक दिव्य ज्योति के समान प्रकाशमान हूँ और ये समस्त रूप जिन्हें तुम अनेक देवी-देवता, जाती, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा, सभ्यता, संस्कृति के आधार पर जिन्हें पूजते हो जिन पर विश्वाश करते हो, ये सब मेरी ही तो किरणे है जो तुम्हें मुझ तक पहुचाने का मार्ग दिखाती है।

संसार में जब और जहाँ मानवता का नाश हुआ तब तब मैंने ही अपने एक अंश को देश/काल/परिस्तिथि के अनुरूप वहा के लोगो को मानवता की दीक्षा व् एकेश्वाद की शिक्षा देने हेतु भेजा।

मेरे द्वारा तुम्हारा मार्गदर्शन करने वाले मेरे ही उस अंश का जो की मुझ दिव्य जयोति की दिव्य किरण है मानवता का पाठ पढ़ाया, तुम्हे तुम्हारा कर्तव्य याद कराया, जो तुम अनेक ईश्वर के वहम में इधर उधर भटक रहे थे, खुद को श्रेष्ट और अन्य को नीच समझ रहे थे उन्होंने तुम्हे मेरे वस्त्विक रूप दीक्षा दी मेरे सच्चे उस रूप से तुम्हें परिचित कराया।

हे मनुष्यों आज जाती, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र, रंग, रूप, सभ्यता व् संस्क्रिति के आधार पर तुम लड़ते हो किंतु न मेरा वस्तिविक रूप तुम जानते हो न उनका जिन्होंने मानव जाती के हो रहे दोहन को रोकने हेतु जन्म लिया व् मेरे द्वारा बताये गये मार्ग को तुम्हे दिखाते हुए एकेश्ववाद दीक्षा दी।

हे मनुष्यों मैं पहले भी बता चूका हूँ और आज फिर से कहता हूँ न तो कोई जाती न धर्म न संस्कृति न सभ्यता न भाषा प्रथम है न अंतिम, इसी तरह जितने भी धर्म शास्त्र है धरती पर सभी की अपनी महत्ता व् सभी अति प्राचीन है, सभी एक दूसरे से जुड़े है सभी एक है सभी मेरे निराकार रूप का वरनं करते है, इसलिये कभी किसी को हेय दृष्टि से न देखो न खुद पर अहंकार करो,

हे मनुष्यों बस इतना याद रखो तुम चाहे मेरी जिस किरण पर आस्था रखते हो, मेरी ही किरण की बातो पर विश्वास करते हो चाहे वो कोई भी हो, सब तुम्हे मेरे पास ही पहुचाती है साथ ही तुम्हें एक आदर्श मानव बनती है यदि उनके आदेशो का पालन करते हो तो......।"



कल्याण हो

Saturday, 22 April 2017

ईश्वर वाणी-२०५, बुद्धि परीक्षा


ईश्वर कहते हैं, "हे मनुष्यों यु तो मैं कभी किसी जीव को गलत अथवा असत्य का ज्ञान नही देता, सदा सभी को मानव धर्म की ही दीक्षा देता हूँ।
किन्तु कभी कभी तुम्हारी बुद्धि परीक्षा हेतु तुम्हे गलत ज्ञान भी देता हूँ, तुम किसी भी धर्म शास्त्र पर आस्था रखते हो किन्तु कहीं न कही तुम्हारी बुद्धि की परीक्षा हेतु अनुचित तथ्य उसमे डाले है ताकि तुम अपनी बुद्धि का उपयोग कितना करते हो ये मैं जान सकु, क्या तुम आँख बन्द कर मुझपे यकीन करते है तभी धर्म शास्त्रो में उपस्तिथ सभी बाते तुम्हे ठीक लगती है किन्तु वास्तिविक जगत के आधार पर देखजाये तो उचित नही है।
हे मनुष्यों मैं तुम्हारी बुद्धि की परीक्षा इसलिये लेता हूँ और इसलिये धर्मशास्त्र में भी कुछ अनुचित तथ्य इसलिए जोड़े ताकि तुम गलत सही में भेद कर सको, जो अनुचित व् जीव मात्र को नुक्सान पहुचने वाला तथ्य है उसे अपने व्यवहार में न लाओ।
हे मनुष्यों आँख बन्द कर मुझपे विश्वाश मत करो, और इस कारण ही वो तत्व धर्म शास्त्र में जोड़े है हर वो धर्म शास्त्र जिसे तुम मानते और विश्वास करते हो, ऐसा इसलिये ताकी कोई कुटिल शैतान का उपासक तुम्हे बरगला न सके, कोई ईश्वर की कही बातें तुम्हे बता अनुचित व् अनेतिक कार्यो में न लगा दे, मेरे नाम से अनेक प्रकार के प्रलोभन तुम्हे दे कर मानवता की हानि हेतु कार्यो में न लगा दे और तुम आँखे बन्द कर बस उसी की बातो में आते जाओ अपनी बुद्धि का उपयोग ही न करो।
हे मनुष्यों इसीलिए तुम्हे दुःख-सुख की अनुभूति करता हूँ ताकि तुम मुझ पर कितना विश्वाश रखते हो, अगर कोई बुराई का रास्ता अपनाने वाला शैतान का उपासक तुम्हे बरगलाये तो उसके रास्ते पर चलोगे या जो मैंने तुम्हे तुम्हारी बुद्धि के अनुसार गलत सही का निर्णय लेने का अधिकार दिया है उस पर चलोगे।
हे मनुष्यों मेरे लिखे सभी धर्म शास्त्र का सम्मान करो उन पर चलो भी किन्तु जो तथ्य जीव मात्र के अहित के हो तो उन्हें जीवन में न अपनाये, ऐसा तुम करना नही छोड़ोगे तो मेरी कृपा नही अंत में कोप को ही पाओगे, तुम कितनी भक्ति कर लो मेरी किन्तु अंत में शैतान के ही उपासक माने जाओगे और कठोर दंड के भागी बनोगे।"

कल्याण हो

Tuesday, 18 April 2017

कविता

"ए दिल बता मुझे तू कहाँ है
महफ़िल में बता मुझे तू वहां है
ढूंडा तुझे बहुत इन नजारो में
आवाज़ दे बता मुझे तू यहाँ है

ऐ दिल न सता मुझे तू जहां है
न मोड़ मुँह बता मुझे तू कहाँ है
न और रुला मुझे न तड़पा ऐसे
दे तू अपना पता मुझे तू कहाँ है"

कविता

अपनी अधूरी कहानी याद आती है
हर पल बात वही पुरानी याद आती है

तेरा मुस्कुराना मेरे करीब यूँ आना
पल पल तेरी हर वो रवानी याद आती है

कहते है लोग जुदा तू मुझसे हो गया
जो संग जी तेरे वो ज़िंदगानी याद आती है

भले न हो तु आज दुनिया की महफ़िल में
अपनी मोहब्बत की ये निशानी याद आती है

आज भले है अश्क इन आँखों में तेरे बिन
'मीठी-ख़ुशी' की हर नादानी याद आती है

जिये हैं जो ये लम्हें हस कर हमने साथ
साथ तुम्हारे की हर शैतानी याद आती है

अपनी अधूरी कहानी याद आती है
हर पल बात वही पुरानी याद आती है-2