Friday, 27 June 2014

मन की गहराइयों में बसाया है सिर्फ़ तुम्हे



मन की गहराइयों में बसाया है सिर्फ़ तुम्हे, 

अपनी हर सांस में समाया है सिर्फ़ तुम्हे
ना जाना कभी मुझे अकेले यू तन्हा छोड़ कर, 

मैने तो अपनी तकदीर बनाया है तुमहे,
 
और क्या बताऊ तुम्हे मेरे हमदम 

जाने कितनी दुआऔँ से पाया है मैने तुम्हे,

जब टूटे दिल किसी का

जब खनके बर्तन कही पे तो गूँज़ बहुत होये, 
जब टूटे काँच कही पे तो आवाज़ बहुत होये,

पर जब टूटे दिल किसी का ये आवाज़ ना कही होये,
होये ऐसी पीड़ा दिल में जो ना सही जाए और ना 

किसी से कही जाए,ना निभाए कोई 
साथ इस टूटे हुए दिल का,

बस एक ये आँखे है जो देख के मन की 
पीड़ा बस बहती जाए बस बहती जाए 







दिल की गहराइयों में जिसे बसाया

दिल की गहराइयों में जिसे बसाया,
अपना जिसको मैने बनाया,
वो तोड़ गया दिल ये मेरा जिसके साथ 
मैने अपनी ज़िंदगी का हर सपना सज़ाया 

हार गयी सजना तुमसे दिल लगा कर

"हार गयी सजना तुमसे दिल लगा कर,
हार गयी सजना तुम्हारी प्रीत में आ कर,
दिन में अब चेन कहाँ, इन नेनो में भी नींद अब कहाँ,
ढूंडती रहती है दिल की धड़कन ए दिलबर तू है अब कहा,
हार गयी सजना तुम्हे दिल में बसा कर,
हार गयी सजना तुझे हर जगह तलाश कर,
हार गयी सजना तुम्हारी मोहब्बत में आ कर,
हार गयी सजना तुमसे दिल लगा कर..."

Sunday, 22 June 2014

मेरी मजेदार रचनाए

१* पता नई लोग क्यू प्यार करते है, पता नई लोग क्यू इश्क मे डूबे रहते है, कभी  हस्ते है बेवज़ह कभी सर मेरे कंधे पे रख के रोते है



२* दिल मे रहने वाले ही अक्सर दर्द देते है तभी तो हम अपने पास हमेशा पेन किल्लर रखते है, दूर भागता दर्द हमसे अब क्यों की दर्द निवारक दवा को हमेशा अपने मूह में दबाए  है हाहहाहा,



३* "ये मोहब्बत भी क्या चीज़ है यारो कभी हसाती  है कभी रूलाती है, कभी फलक का सितारा बनाती है कभी ज़मीन में मिलती है, ये मोहब्बत भी क्या चीज़ है यारो कभी जीना सिखाती है कभी मौत का पल-2 इंतेज़ार करवाती है, कभी वफ़ा तो कभी बेफाई दिलाती है, ये मोहब्बत भी क्या चीज़ है यारो कभी मिलन तो कभी जुदाई लाती है, कभी ढेरो उमंग तो कभी बेरंग ये ज़ीनदगी बनती है, ये मोहब्बत भी क्या चीज़ है यारो-2"



४*  "ए दिल दीवाने याद ना दिला मुझे वो बाते पुरानी, ए दिल दीवाने ना याद दिला मुझे वो लम्हा जिन्हे करके याद आता है मेरी आँखो से सिर्फ़ अब पानी, ए दिल दीवाने ना याद दिला मुझे उनकी वो निशानी देख जिसे दिल में मेरी आज भी आ जाती है वीरानी, ए दिल दीवाने ना याद दिला साथ उस बेवफा यार की जिसके संग थी कभी मुझे ये अपनी ज़िंदगी गुज़ारनी, ए मेरे नादान दिल ना याद मुझे बीते लम्हो की वो कहानी जिसकी वज़ह से आज कट रही है तन्हा मेरी ये ज़िंदगानी.."



५* "रुला कर मुझे वो हस्ने को कहते है,
जखम दे कर मुझे दवा लगाने को कहते है, टूट कर बिखरता है पल-पल ये मेरा दिल जिनके सितम से, दे कर फेविकोल की बोत्तेल हर बार दिल जोड़ने को कहते हैं" हहहे



६* "आज नही तो कल ये नारा होगा, ज़मीन से ले कर फलक तक एक नाम हमारा होगा, जीत लेंगे हम भी ज़िंदगी हर एक जंग, पा लेंगे अपनी मंज़िल को भी एक दिन, हर किसी की ज़ुबान पे कभी नाम भी हमारा होगा, गगन पे चमते तारो की तरह धरती पे दिखता एक सितारा होगा, दुनिया की भीड़ में एक दिन कभी नाम हमारा होगा "



७* "दर्द में मुझे वो मुस्कुराने को कहते है, बहते हुए इन अश्को को छिपाने  को कहते है, वो होंगे इतने बेरहम हमे मालूम ना था, जल रहा है मूह मेरा ज़ुबान पे निकले इन छ्चालो से और मुझे वो गोल गप्पे खाने को कहते है" बेरहम दोस्त हहेहहे



८* "किसी ने कहा हमसे लिखो कोई मुक्तक,
उठा ली हमने एक पुस्तक
लिख लिख दी उसमे गिनती दस तक,
लो बन गया पहला हमारा काव्या मुक्तक", हहहे ंक्षत् त्यम सीरीयस पक्का



९* "उनके लिए लिखी एक चौपाई, पास बुला कर हमने उन्हे सुनाई, सुन कर उन्होने हमे दी दुहाई, है कसम तुम्हे हमारी, है अगर  थोड़ी भी जान हमारी प्यारी है , ना देना अब और मुझे ये प्रताड़ना, मेरी है तुमसे ये  प्राथना, ना अब फिर कभी करना ये लिखाई, ना सुनाना हमे अपनी चौपाई " हाहहाहा ंक्षत् टाइम सीरीयस पक्का



१०* "मुझे कल मिली मेरी सहेली साबिता(चेंज्ड नेम), उसकी खिदमत में लिखी एक कविता, पर जाने क्यों बदला-2 उसका मिज़ाज़ था शायद इसलिए की उसके पति का नाम बजाज था, साथ जहाँ वो उनके निकली अकेली थी, राह में बरसो बाद उसको मिली उसकी सहेली थी, देख उसे जहाँ पुकारा उसने 'साबिता', उड़ गये उसके होश क्योंकि साथ उसका पति था, करते नही थकती  थी जहाँ तारीफ अपने पति की वो आज सामने खड़ा शख्स वो ही था, फूटी थी एक आँख उसकी और हर एक दाँत भी नकली था, देख उस हसीन शख्स को दिल से बस ये ही निकला 'अर्रे वा री साबिता, क्या इसी का इंतेज़ार तूने बरसो किया था', याद कर उन दोनो के इश्क की दास्तान हमने  लिख डाली खिदमत में उनकी बस एक कविता, वा री साबिता वा



११* "बुझे हुए चिरागो से रोशनी नही होती, मैं वो सूरज हूँ जिसके बागेर दिन की शुरुआत नही होती"



१२* "हसना हसाना गीत गाना ये ही है जीवन का मेरे एक अफ़साना, रोना रुलाना सताना दिल लगाना ये है आशिक का आशिकाना"



१३* "ग़रीबी ने हमे सुधार दिया दोस्तो वरना नशेड़ी हम भी कम ना थे"


१४* मेरी दुआ में तुम हो,

मेरी सुबह में तुम हो,

मेरी हर शाम में तुम हो,

मेरी साँसों में तुम हो,

मेरी बातो में तुम हो,

तुम्हे क्या बताए ए मेरे हमदम 
मेरे तो हर ज़ज़्बात में तुम हो



Friday, 20 June 2014

एक बेटी हूँ मैं

एक बेटी हूँ मैं, कही बड़ी तो कही छोटी हूँ मैं,
हूँ कही खुश तो कही रोती हूँ मैं,एक बेटी हूँ मैं
लुटाती हूँ अपनी खुशियाँ अपने घर आँगन में
वही पल पल घुट कर हर  दिन  जीती हूँ मैं,एक बेटी हूँ मैं

ले मुझे अपनी गोद में जन्म पे मेरे सबसे पहले माँ की आँखे ही  भर आई,
जुबाँ से नहीं कहती वो कुछ पर देख मुझे गोद में 
 दिल से उनकी भी है एक आह निकल आई , एक बेटी हूँ मैं,
होंठ रहे  खामोश उनके पर देख मुझे आँखों से उनकी  
अश्को की नदी है बही चली आई, एक बेटी हूँ मैं

नहीं बंटती जन्म पे मेरी यहाँ  मिठाई,
न ही देता है कोई मेरे जन्म पे बधाई,एक बेटी हूँ मैं
दुनिया में आते ही कहते है मुझे लोग  की मैं तो हूँ पराई
एक दिन मेरी तो होगी विदाई,एक बेटी हूँ मैं

बचपन से सुनती हूँ ये ताना, शायद  इसलिए नहीं मिलता
मुझे मेरी पसंद का भी कोई खिलौना,एक बेटी हूँ मैं
हर दिन लड़की होने का दंश में सहती हूँ,
अपनों के ही भेद-भाव का  पल-पल शिकार होती हूँ,एक बेटी हूँ मैं

सुनती हूँ हर दिन बस ये ही बात की बेटी तो होती है धन  पराया,
लिया होगा कर्ज़ा कोई पिछले जन्म में तभी तो
 बेटे ने नहीं बेटी ने इस घर में जन्म है पाया, एक बेटी हूँ मैं
 गेरो की क्या कहु अपनों के सामने रोज़ टूटती और बिखरती हूँ मैं,
अंजानो से क्या आशा करू अपनों से प्रेम और सम्मान की अभिलाषी हूँ मैं, एक बेटी हूँ मैं


ख़ुशी में जहाँ भाई के जन्म पे बाटी जाती है मिठाई, 
देते है लोग  भी जन्म पे उसकी ढेरो बधाई, 
होती हूँ मैं भी खुश, भुला कर अपना दर्द लगाती हूँ लगे उसे, एक बेटी हूँ मैं,
छोटी हो या हूँ बड़ी हर दिन भाई की दुत्कार सहती हूँ,
नहीं करती कोई शिकवा उसकी सबकुछ चुपचाप सहती हूँ मैं, एक बेटी हूँ मैं,


हर दिन देती हूँ बलिदान अपने अरमानो का,
टूट कर बिखरता है ये मन हर दिन मेरे सपनो का, एक बेटी हूँ मैं,
पिता के लिए एक अनचाहा बोझ हूँ मैं,
भाई की मंज़िल का एक रोड़ा हूँ मैं, एक बेटी हूँ मैं,


पति के लिए कुछ नहीं बस एक दासी हूँ मैं,
उसे मतलब नहीं की प्रेम और सम्मान की कितनी प्यासी हूँ मैं ,एक बेटी हूँ मैं,
मतलब नहीं जहाँ में किसी को आखिर  किस की अभिलाषी हूँ मैं,
करती हूँ कुर्बान हर मोड़ पे अपनी ख़ुशी सिर्फ इसलिए की एक बेटी हूँ मैं,


 नहीं मिलता सम्मान मुझे जहाँ से, लूटता है हर दिन मेरा मान यहाँ पे ,
आँखों में अश्क लिए हर दिन जीती हूँ मैं सिर्फ इसलिए एक बेटी हूँ मैं,
 जुदा हो कर भी जुदा नहीं रहती अपनों से  मैं,
दूर जा कर भी पास सदा रही हूँ  मैं,  एक बेटी हूँ मैं


माना बेटो जैसी नहीं मैं, माना जीवन भर पास नहीं मैं,
माना दूर ले जाता है मुझे मेरे अपनों से समाज का ये ताना-बाना एक बेटी हूँ मैं
दूर अपनों से जा कर, गेरो को अपना बना कर अपनों को भी   दिल में बसाती हूँ मैं,
पत्नी बहु और माँ बन कर भी सभी अपने धर्म निभाती मैं, एक बेटी हूँ मैं
बेटे भूल जाए चाहे अपना धर्म पर अपने सभी कर्त्तव्य निभाती मैं क्योंकि एक बेटी हूँ मैं 








Wednesday, 18 June 2014

सबके सब भूल गये मुझे मेरे दोस्त



1* "उनसे मेरी फिर मुलाकात हुई, उनसे मेरी फिर बात हुई, हम तो डूबे थे कल तक अकेले तन्हाइयो के अंधोरे में, मिल कर उनसे आज फिर खुशियो की बरसात हुई"



2* "मेरे सपनो के राजा अब तो सामने तू आजा, ना भले संग तेरे घोड़ा और हाथी हो, ना भले संग तेरे साथी हो, ना भले संग बैँड बाजा और बाराती हों, चुपके से आकर इस दिल में तू समाजा, कैद कर लू तुझे  अपनी साँसों  के कैदखाने मैँ, एक बार तू  मेरे  नजरों के सामने तो आजा........."



3* "एक परी हूँ मैं, आसमान से आ कर तुम्हारे सामने आज खड़ी हूँ मैं, माँगो जो माँगना है तुम्हे मुझसे, तुम्हारे लिए ही तो जन्नत छोड़ इस ज़मीन पे उतरी हूँ मैं"


4* "हर दुख-सुख में साथ निभाते है दोस्त, गेर हो कर भी कितने अपने होते है ये दोस्त, दिल टूटे या अपना कोई छूते, हर कदम पे साथ निभाते है दोस्त, बहते हुए अश्क़ो को पोच खुद रो जाते है दोस्त, मंज़िल भले हो सबकी अलग, हो रास्ते भले सबके अलग, दूर जा कर भी दिल के पास सदा रहते है दोस्त, हर ग़लती और खता को मुस्कुरा कर भुला देते है दोस्त, जब चलती है साँसे ज़िस्म में तब तक निभाते है साथ ये दोस्त, जुड़ा हो कर भी पल-पल पास रहते हैं दोस्त,

किस्मत से शिकायत  है मेरी इतनी सी की आख़िर मुझे क्यों ना दिए ऐसे दोस्त, बेवफा आशिक की तरह मेरी वफ़ा-ए-दोस्ती भुला कर अपनी ज़िंदगी में ऐसे मसगूल हुए वो के सबके सब भूल गये मुझे मेरे दोस्त"

Sunday, 15 June 2014

(वो कौन थी?)


"सूनी सड़क और ये काली रात थी, भीगी हुई थी ये धरती  क्या बरसात थी, अंधेरी रात में, 

सुनसान स्थान में जाने कौन वो मुझे पुकरती थी, ना था निशान दूर-2 तक जहाँ इंसान का 

वहा वो थी कौन जिसके पुकारने की आवाज़ हर पल मुझे  आती थी, जब सुन कर उस आवाज़ को 

जाने लागू में पास उसके वो दूर और जाने कहाँ ले जाती थी, सुनसान सड़क और अंधेरी रात में 

पुकार कर बार-बार मुझे  ही भटकाती थी, चल कर उस आवाज़ की ओर भी वो कभी ना मुझे 

अपनी छवि दिखलाती थी, थी कौन वो कोई पारी या अप्सरा, थी कौन वो किसी प्रेत या चुड़ेल का साया, 

बहुत ढुंडा उसे उन रास्तो पर कभी ना पड़ी खुद को मुझे दिखलाती थी, सूनी और उन

 सुनसान राहों पर जाने क्यों और किसलिए मुझे बुलाती थी, ना पता मुझे मकसद के उसके 

और ना पता वो थी कौन, पर मेरी ज़िंदगी की आखरी सांसो के थमने तक मुझे अपने पास बुलाती थी" 
(वो कौन थी?)

बरसो बाद मुझे तेरी याद आई है

"बरसो बाद मुझे तेरी याद आई है, बरसो बाद इन आँखो से अश्क बन कर मुझसे मिलने तू आई है,

 बरसो बाद मिली मुझे ये  तन्हाई है, बरसो बाद मिली मुझे तुझसे ये  जुदाई है,

 बरसो बाद क्यों की तूने मुझसे ये बेवफ़ाई, वादा उमर भर साथ जीने का था तेरे, पर क्यों मेरे लिए तूने ही अपनी ये ज़िंदगी गवाई  है,

 बरसो बाद क्या तूने दी मेरी मोहब्बत की ये  वफ़ाई है, दिल पूछता है मेरा ए मेरी दिलरूबा

 बरसो बाद भी क्यों तू मेरे प्यार को ना समझ पाई है, रहे जुदा तू मुझसे चाहे जन्मो जनम ए मेरे हमदम 

पर मेरी तो हर साँस में यूगो यूगो से सिर्फ़ तू ही तो समाई है, सिर्फ़ तू ही तो समाई है"

तू ही मेरा प्यार है

"तू ही मेरा प्यार है, 
तू ही मेरा संसार है, 
तू ही तो जीवन का सार है, 
और क्या  बताऊ  तुझे ए बेवफा 
तू ना सही पर तेरी यादो के बगेर 
जीना मेरा बेकार है.."

ये ज़हर पीना मुझे अच्छा लगता है,

नशे में डूबे जाना मुझे अच्छा लगता है, ये ज़हर पीना मुझे अच्छा लगता है,
 चलते हुए इन राहों में यू लड़खड़ा कर गिर जाना  मुझे अच्छा लगता है,

 पी कर इस ज़हर को दुनिया भुला देना मुझे अच्छा लगता है, 
हो कर बेख़बर ज़हां से नशे को गले लगाना मुझे  अच्छा लगता है, 

भुला कर सबको बस इस नशे में रहना मुझे अच्छा लगता है,
 टूटे हुए दिल में इससे दिल लगाना मुझे  अच्छा लगता है,

 हर गम में दवा बना कर इसे पीना अच्छा लगता है,
 ज़िंदगी से हार कर ज़िंदगी इसे बनाना मुझे अच्छा लगता है, 

हर दर्द में सहारा लेना इसका ही मुझे अच्छा लगता है,
 भूख लगे या प्यास बस नशे में रहना ही मुझे अच्छा लगता है,

 लोग दूर जाए या रहे मेरे पास मुझे तो बस नशे में  खोये रहना अच्छा लगता है
,नशे में डूबे जाना मुझे अच्छा लगता है,ये ज़हर पीना मुझे अच्छा लगता है,

Thursday, 12 June 2014

तेरे बिन क्या है जीना, क्या है जीना तेरे बिन, बिन तेरे हूँ भला क्या मैं, क्या हूँ मैं तेरे बिन,

तेरे बिन क्या है जीना,
  क्या है जीना तेरे बिन,

बिन तेरे हूँ भला क्या मैं,
 क्या हूँ मैं तेरे बिन,



तेरे बिन कही चेन मुझे मिले न,
  चेन ना आये कही  तेरे बिन,

बिन तेरे मिले न सुकून मुझे, 
कही सुकून ना आये मुझे बिन तेरे,



तेरे बिन दिन न कटे, 
न कटे ये दिन भी तेरे  बिन,

बिन तेरे न रात कटे,  
न कटे ये रात भी बिन तेरे,


तेरे बिन न है ये सुबह मेरी,
 न है ये सुबह मेरी तेरे बिन,

बिन तेरे है हर शाम से ये दूरी मेरी,
 है अब दूरी मेरी हर शाम से बिन तेरे,



तेरे बिन न है ख़ुशी मेरी, 
न है ख़ुशी मेरी  तेरे बिन,

बिन तेरे न है इन लबों पे हसी,
 न है हसी इन लबों पे बिन तेरे,


तेरे बिन टूट कर बिखर गयी है
 हर जगह हर कही ये  "मीठी-ख़ुशी ",

 बिखर गयी है टूट कर
 हर कही हर जगह' तेरे बिन, 


बिन तेरे जाने कहाँ
 खो गयी है ये 'मीठी-ख़ुशी', 

जाने कहाँ खो गयी  है बिन तेरे,

तेरे बिन न इसे चेन मिले, 
न मिले चेन इस तेरे बिन,

तेरे बिन पुकारती है ये तुझे हर कही, 
कहती रहती है बस ये है,

तेरे बिन क्या है जीना,
 क्या है जीना तेरे बिन,

बिन तेरे हूँ भला क्या मैं, 
क्या हूँ मैं तेरे बिन,


तेरे बिन क्या है जीना,
 क्या है जीना तेरे बिन,

बिन तेरे हूँ भला क्या मैं, 
क्या हूँ मैं तेरे बिन,



बाबू जी धीरे चलना

1*"मेरी जान भी तू है, मेरा हर अरमान भी तू है, मेरी शान भी तू है, मेरी पहचान भी तू है, मेरा घुमान भी तू है, मेरा अभिमान भी तू है, तुझे और क्या बताऊ ऐ मेरे नन्हे शैतान मेरी तो जिन्दगी की हर सुबह और शाम भी तू है, तेरा बिना कुछ भी नही मैँ, मेरा तो ईमान भी तू है, मेरा ये जहाँ भी तू है", for my Putwa(Boss) my baby my grandson



2*"तुझे भूल जौ मैं ये मुझे गवारा नही, तेरे बिन रह सकु

मैं एक पल मुझे ये गवारा नही,

साथ मेरे दुनिया है पर थाम के चालू हाथ किसी और का मुझे ये गवारा नही,

गुज़ारनी पड़े मुझे ये ज़िंदगी चाहे तन्हाइयो के अंधेरो में

पर तेरे सिवा किसी और का सहारा भी मुझे ये गवारा नही"



3*"एक कानीए से प्यार किया, 

उससे नज़र को तीन किया

 हाए रे हमने ये क्या किया,

काने नैने वाला निकला लुटेरा,

 छीन के हर खुशी मेरी मूह ऐसा फेरा,

जाने क्या देख मैने उसपे ऐतबार किया,

 सबने मुझसे माना किया  

पर फिर भी मैने उसी से ही प्यार किया,

 हाए रे हमने ये क्या किया" 


4* "बाबू जी धीरे चलना नेट पे ज़रा संभलना, बड़े धोखे है इस नेट पे, दोस्ती करने से तुम तोड़ा सा डरना, बाबू जी धीरे चलना"

क्या रखा है हमने हमारा ये देश संभाल के,



पासे सभी उलट गये थे कभी  जहाँ दुश्मन की चाल के,
अक्च्छर सभी पलट गये थे जहाँ भारत के भाल से,

मंज़िल पे आया था कभी मुल्क हर बला को टाल के,
सदियों के बाद फिर उड़े थे कभी बादल यहा गुलाल के,



वो लाए थे तूफान से कश्ती  निकाल 
के
क्या रखा है हमने हमारा ये देश संभाल के,-2
क्या ऐसा ही भविश्य में हमे देखा था 

उन्होने भारत विशाल के,
क्या रखा है हमने हमारा ये देश संभाल के,

हर कही बर्बाद हो रहा है ये बगीचा
इसको हृदय के खून से कभी बापू ने था सीचा-2
रखा था इससे कभी शहीदों ने बाल के,
क्या रखा है हमने हमारा ये देश संभाल के,

दुनिया के दाँव पेच में उलझे हैं शान से,
मज़िल हमारी क्या थी और भुला दिए हैं रास्ते,-2
भटक गये हैं आज हम अपने संघर्षों को भुला के,
क्या रखा हैं हमने हमारा  ये देश  संभाल के,


घोटालों और भ्रष्टाचार से आज भ्रष्ट हैं ये दुनिया,
आतंक वादियों के निशाने पे हर दम है ये दुनिया-2
व्याभिचार के अत्याचारो से तरष्ट है आज ये दुनिया
कितना रखा हमने यहा खुद को संभाल के,
क्या रखा है हमने हमारा ये देश संभाल के,

आराम की भूल भुलैये में हम 

अपने अतीत को हैं भूले,
सपनो के हिंडोलेओं पे मगन हो के 

हम शहीदों के ख्वाबों को हैं भूले-2

आज़ादी दिलाने के लिए 
जिन्होने जान थी गवाई-2
आज़ाद और खुशाल हिन्दुस्तान की तश्वीर 
जिनकी आँखों में हर पल थी छाई,
क्या रखा है हमने हमारा ये देश संभाल के,

भले दुनिया में दिखाने के लिए 

छु लिया हो आसमान को,
पहुचा दिया है भले हमने आज 

औरों की तरह आसमान में  इंसान को-2

दिल से पुछो क्या सच में कुछ दिया 

हमने हिन्दुस्तान को,
क्या रखा है हमने हमारा 

ये देश संभाल के,

क्या भूख ग़रीबी को मिटाया हैं हमने यहा से,
बेरोज़गारी और लाचारी को क्या दूर भगाया है यहा से,
मर रहे हैं सेंक़डो भूख से ये निर्दोष इंसान यहा के,
क्या रखा है हमने हमारा ये देश संभाल के,

वो लाए थे तूफान से कश्ती  निकाल 
के-2
क्या रखा है हमने हमारा ये देश संभाल के,
क्या ऐसा ही भविष्या में हमे देखा था

 उन्होने भारत विशाल के,
क्या रखा हैं हमने हमारा देश संभाल के,

Saturday, 7 June 2014

meri rachanaye-मेरी रचनाए


1* jaise toot kar bikharte hain moti maala se mere bhi khwaab toot kar gaye, jaise toot kar bikhar jaata hai tara zamin par mere bhi arman bikhar gaye, log jo aaye the kareeb mere jaane kyon sabhi wo door mujhse ho gaye, shayad rishte nahi sambhaale maine ya fir wo hi meri wafadaari se sharmshaar ho gaye, wo the bewafa na badal sakte the wo apni firtart, shayad tabhi wo sabhi mujhse door gaye, mehboob ki to baat hi chhodiye yaha dost khud ko batane wale bhi meri dosti se haar gaye, matlab ke liye diya tha saath jinhone, maltlab ke baad sabhi mujhse door gaye, na padega fir unhe koi kaam unhe mujhse ye hi soch kar har koi mujhse door gaye, takdeer meri nahi unkee bewafa thi shayad tabhi to premi hi nahi dost bhi mujhse door gaye, jaise toot kar bikharte hain moti maala se mere bhi khwaab toot kar gay,jaise toot kar bikharte hain moti maala se mere bhi khwaab toot kar gay.....

1* जैसे टूट कर बिखरते हैं मोती माला से मेरे भी ख्वाब टूट कर गये, जैसे टूट कर बिखर जाता है तारा ज़मीन पर मेरे भी अरमान बिखर गये, लोग जो आए थे करीब मेरे जाने क्यों सभी वो दूर मुझसे हो गये, शायद रिश्ते नही संभाले मैने या फिर वो ही मेरी वफ़ादारी से शर्मसार हो गये, वो थे बेवफा ना बदल सकते थे वो अपनी फ़ितरत, शायद तभी वो सभी मुझसे दूर गये, महबूब की तो बात ही छोड़िए यहा दोस्त खुद को बताने वाले भी मेरी दोस्ती से हार गये, मतलब के लिए दिया था साथ जिन्होने, मतलब के बाद सभी मुझसे दूर गये, ना पड़ेगा फिर उन्हे कोई काम उन्हे मुझसे ये ही सोच कर हर कोई मुझसे दूर गये, तकदीर मेरी नही उनकी बेवफा थी शायद तभी तो प्रेमी ही नही दोस्त भी मुझसे दूर गये, जैसे टूट कर बिखरते हैं मोती माला से मेरे भी ख्वाब टूट कर गये,जैसे टूट कर बिखरते हैं मोती माला से मेरे भी ख्वाब टूट कर गे.....

 


 



2* tum na mile hote to ham bikhar gaye hote, the itne tanha ki tum bin jane kahan kho gaye hote, yu to mile senkdo mujhe zahan mein, par tum na mile hote to ham jeena bhool gaye hote, tum na mile hote to jane ham kahan hote

2* तुम ना मिले होते तो हम बिखर गये होते, थे इतने तन्हा की तुम बिन जाने कहाँ खो गये होते, यू तो मिले सेंकडो मुझे ज़हन में, पर तुम ना मिले होते तो हम जीना भूल गये होते, तुम ना मिले होते तो जाने हम कहाँ होते
 
3* "main wo tara nahi bujha hua jo toot kar bikhar jaata hai iss zamin par, main to wo sooraj hu jo khud ko jala kar roshni deta hu iss sarzin par....."

3* "मैं वो तारा नही बुझा हुआ जो टूट कर बिखर जाता है इस ज़मीन पर, मैं तो वो सूरज हू जो खुद को जला कर रोशनी देता हू इस सरज़ीन पर....."

 


4* "kabhi khul kar hasne ki hasrat thi hamari, kabhi khul kar zindagi jeene ki fitrat thi hamari, aasam to kam hai aakash mein hi bas jaane ki ek khwaaish thi hamari,

par na pata tha hame milegi kismat se hi ye laachari, bas khushi ke chand lamhe ham chahte the, khushi ke naam par mili hai hame har shaks se ashko ki ye dhaari.......... "



4* "कभी खुल कर हासणे की हसरत थी हमारी, कभी खुल कर ज़िंदगी जीने की फ़ितरत थी हमारी, आसमान  तो कम है आकाश में ही बस जाने की एक ख्वाइश थी हमारी,

पर ना पता था हमे मिलेगी किस्मत से ही ये लाचारी, बस खुशी के चाँद लम्हे हम चाहते थे, खुशी के नाम पर मिली है हमे हर शख्स  से अश्को की ये धारी.......... "
 

Friday, 6 June 2014

दोस्तों आप सभी को मुझे ये बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है की







Updated 15 minutes ago · Taken at World Environment Day Festival....................
दोस्तों आप सभी को मुझे ये बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है की कल गंतव्य संस्थान के तत्वाधान में विश्व पर्यावरण के उपलख्य में एक भव्य काव्य गोष्टी का आयोजन किया गया था जो तीन चार चरणों में संपन्न हुआ जो अलग अलग कार्यक्रमों पर आधारित थे| जिसका पहला चरण कमला जीनत जी की दो पुस्तकों का विमोचन था और दुसरे चरण में काव्य पाठ, इस काव्य गोष्टी में दूर-दूर से आये कवि और कवयित्रियो ने पर्यावरण संरक्षण हेतु बहुत ही सुन्दर काव्य पाठ किया बहुत से युवा कवियों ने भी पर्यावरण की सुरक्षा हेतु बहुत सुन्दर कविताये प्रस्तुत की, लगभग 20 से 25 लोगों ने काव्य पाठ किया सभी के काव्य पाठ ने गोष्टी में चार चाँद लगा दिए. कार्यक्रम में आमंत्रित गणमान्य व्यक्तियों ने दीप प्रजल्वित करके कार्यक्रम की शुरुआत की| मुख्य अतिथि श्रीमती शोभा गुप्ता जी भी कार्यक्रम में उपस्थित थी उनके उद्गार बहुत प्रेरक थे, इस काव्य गोष्टी का मंच संचालन हम सभी के प्रिय कवि नरेश मालिक जी के द्वारा बहुत शानदार तरीके से किया गया उनका संबोधन हृदयस्पर्शी था| नरेश मलिक जी द्वारा किया गया काव्य पाठ भी मधुर और प्रेरणादायक था जिसे सब लोगों ने पसंद किया और तालियों से उनका स्वागत किया|, और अंतिम चरण में वृक्षारोपण भी किया और मैंने और मेरे कई साथियों ने पौधा लगाकर विश्व पर्यावरण दिवस मनाया| मुझे भी पर्यावरण संरक्षण हेतु काव्य पाठ करने का अवसर प्राप्त हुआ ये मेरा पहला काव्य पाठ था जो पर्यावरण पर आधारित था सभागार में अधिक संख्या में लोग उपस्थित थे सभी लोगो ने काव्य पाठ का भरपूर आनंद लिया और शुभ संध्या के साथ इस भव्य काव्य गोष्टी का समांपन हुआ
काव्य पाठ के साथ साथ कवाली का भी कार्यक्रम हुआ जहाँ हमे कवाली भाइयों की मधुर आवाज सुनने को मिली मैं उनका भी तह दिल से शुक्रिया..........


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Thanks and Regards
*****Archu*****

Tuesday, 3 June 2014

पर्यावरण पर मेरी रचना -रह जाएगा मनुष्य इस धरती पे केवल किस्से कहानियों में एक दिन

कुदरत ने इस धरती को ऐसा तोहफा दिया, आग के गोले सी वीरान थी ये धरती इसको आबाद किया, झमा झम बरसा बरखा का जल   इसमें जीवन दिया, हर कही हर जगह यु ही वृक्षों का आगमन हुआ, जीवन जिसका निसान न था इसमें यहाँ पनपने लगा,


जीवों का आगमन हुआ, ये चमन चहकने लगा, कल तक था जो वीरान आज महकने लगा, सूनी पड़ी थी जो धरती आज गुलज़ार होने लगी, पेड़ों को अपनी गोद में ले कर जीवो को अपनी बाहों में ले कर ये भी इतराने लगी, कल तक जो कोई न था इसका आज माँ बन कर सबको पालने लगी,



फिर हुआ मनुष्य का जन्म धरती हिलने लगी, बन कर माँ धरती ने मनुष्य की भी परवरिश सबकी तरह ही की, पर वक्त के साथ मानव बदलने लगा, माँ समझता था कभी जिस धरती को आज उसे ही कुचलने लगा, धरती रोने लगी, आंसू बहाने लगी,


मनुष्य निकला स्वार्थी न आई उसे दया जरा भी, स्वार्थ में आ कर प्रकृति को उजाड़ने लगा, जो करती हरियाली हरी धरती माँ की उसे ही उजाड़ने लगा, थे जो जीव धरती पर उससे पहले उन्हें ही अपना शिकार बनाने लगा,


जीवन जीने के लिए बहुत कुछ दिया था धरती ने उसे लेकिन वो संतुष्ट न हुआ, आत्म संतुष्टि के लिए उसने सबको तबाह किया,


वृक्षों को काट कर अपनी बस्तिया वो  बसाने लगा, जिह्वा तृप्ति के लिए निरीह जीवो को मारने लगा, सूनी होने लगी ये धरती, कराहने लगी ये धरती, जब मानव ने नहीं बदली अपनी ये शोषणकारी रणनीति कुदरत बिगड़ने लगी,



आने लगे रोज तूफ़ान और ये धरती हिलने लगी, बाढ़ और आपदा, अनेक बवंडरों के साथ सूनामी  भी आने लगी,  रोती हुयी ये धरती भी रोज़ फटने लगी, बरसों से शांत भूमि की गर्मी ज्वालामुखी बन कर हर कही फटने लगी,



जो मिला था मानव को कुदरत से उससे छीनने लगा, आधुनिक कह कर खुद को मानव सांत्वना देने लगा, प्रकृति के इस प्रकोप के आगे वो बेबस रहा,


सोच रहा आज मनुष्य का संगठन जो न रोका गया प्रकृति का यु ही दोहन वो दिन दूर नहीं ख़त्म जाएगा सब कुछ और रह जाएगा मनुष्य इस धरती पे केवल किस्से कहानियों में एक दिन, किस्से कहानियों में एक दिन, किस्से कहानियों में एक दिन… 



पर्यावरण पर कविता -जाने कहाँ खो गयी

कभी जहाँ हरियाली की चादर थी बिछती, कभी जहाँ डाली पर  वो कलि थी खिलती, फूलों से लदी होती थी कभी उसकी हर शिखा, फलों से झुकी  होती थी हर टहनी हर कही और हर जगह, 


पंक्षियों का मधुर संगीत  पड़ता था सुनाई हर शाम और  सुबह, जिस डाली पर बैठते थे कभी तोता और मेना, जिन्हे पकड़ने के लिए भागते थे मैं और बहना, 


वो हरियाली जाने कहाँ खो गयी, जिस डाली पर खिलती थी कली वो डाली जाने कहाँ गुम हो गयी, फूलो से लदी वो शिखा जाने कहाँ  रह गयी, वो फलों से झुकी टहनी  जाने कहाँ खो गयी,


पंक्षियों का वो संगीत भी अब नहीं पड़ता कही सुनाई, मशीनो की ध्वनि के आगे नहीं पड़ती अब किसी की आवाज़ अब सुनाई, नहीं दिखते अब बैठे कही वो तोता और मैना, दिखता है अब हर कही चिमनियों से आता ये काला  वो धुंआ,


वो पंक्षियों का संगीत जाने कहाँ खो गया, वो तोता और मेना का मेरे आँगन में आना क्यों रह गया, वो हसीं पल जाने कहाँ अब खो गया,





नदिया भी कभी बहती थी निर्मल, होता था जिसका जल भी कितना पावन और शीतल,पी जिसे हो जाता था  ह्रदय भी कितना पाक और कोमल, 

वो नदियां हमारी कहाँ खो गयी, हर नदी अब यहाँ मेलि हो गयी, तरक्की के नाम पर आज ये नदिया अब बस नाली हो गयी, पाप हमारे सारे सर अपने ले गयी, वो नदिया हमारी कहाँ खो गयी,



 कभी जहाँ बिखरा था जंगले, रहते थे जिसकी बाहों में सेकड़ो पंक्षी और जानवर हरदम, वो जंगल जाने कहाँ खो गए,हर जगह अब यहाँ मनुष्य हो गए, कौन सुने उन बेजुबानों की जिनके आशियानों पर मानव के कब्जे हो गए, ये जंगल जाने कहाँ खो गए ,




है आज दुनिया में अथाह विशाल समंदर, रहते हैं जिसमे अनेक जीव भी उसके अंदर,  फैल  रहा है दुनिया में समंदर का व्यास, आ रहा है वो और भी करीब और भूमि के पास, लेकिन विलुप्त होने लगे  जीव समंदर के, उन्हें नहीं मिल रहा इसका लाभ, जीभ के स्वाद से विवश मनुष्य बना रहा है उन्हें अपना ग्रास, जीते थे  कभी सुकून से समंदर की गहराई में वो जीव जाने कहाँ खो गए ,




था खड़ा कभी हिमालय अपना सीना तान कर, रखता था दूर हर कहर और तूफ़ान को अपनी शान मान कर, आते थे लोग पूजने उसे गंगोत्री, यमुनोत्री का पावन स्थान मान कर, शुद्ध होती थी उसकी ऐसी हवा दूर हो जाती थी सबकी बीमारी बिना किसी दवा, कुदरत का ये इशारा था, प्रकृति का ये  बेहतरीन नज़ारा था,


ये नज़ारा जाने कहाँ रह  गया, दूर रखता हिमालय जिस कहर और तूफ़ान को आज आ कर वह हर लेता है जाने कितनी मासूम जान को, पूजन करते थे जिस पावन  धरती का लोग  आज दूर भागते है उस पावन मिटटी से सब लोग , शुद्ध होती उस हवा में ऐसा ज़हर आया हर बीमारी  का कीटाडु  भी इसमें अब है  समाया, कुदरत वो इशारा जाने कहाँ  खो गए ,प्रकृति का ये नज़ारा जाने कहा रह गया,



 कभी जहाँ हरियाली की चादर थी बिछती, कभी जहाँ डाली पर कलि थी वो  खिलती, वो हरियाली की   चादर कहाँ खो गयी, जिस डाली पर खिलती थी कली वो डाली जाने कहाँ गुम हो गयी, 

 कभी जहाँ हरियाली की चादर थी बिछती, कभी जहाँ डाली पर कलि थी वो  खिलती, वो हरियाली की   चादर कहाँ खो गयी, जिस डाली पर खिलती थी कली वो डाली जाने कहाँ गुम हो गयी, 


 कभी जहाँ हरियाली की चादर थी बिछती, कभी जहाँ डाली पर कलि थी वो  खिलती, वो हरियाली की   चादर कहाँ खो गयी, जिस डाली पर खिलती थी कली वो डाली जाने कहाँ गुम हो गयी,



मेरी हर याद भी मिटा डाली,


एक नन्ही  सी कली थी, बगीचे मेी खिली थी, माली की लाड़ली दुलारी थी, उसे बहुत प्यारी थी, नाज़ों में पली थी, खिल कर फूल बनने चली थी, बन कर फूल इस बगिया को महकाने में चली थी, पर ना पता था मुझे की खिल कर  कली का फूल बन  बगिया महकाना ज़ुर्म होगा, खिल कर यहा छा जाना हर किसी को नामंज़ूर होगा, बन कर फूल खिली जिस डाली पे माली की ही नियत डोली,

 झूलती थी जिस डाली पे, पत्तियों की शैया पर कभी सर अपना रख कर भी सोती थी, आज उखाड़ फेंक दिया उसीने जिसकी दिन और रात बिन मेरे ना होती थी, करके तबाह मेरा जीवन उसके घर में हर दिन होती  होली और दिवाली , 

 पाला था नाज़ो से जिसने मुझे उसीने मेरी हर पंखुंडई तोड़ डाली, कभी बड़ाई थी रोनक जिस बाग की मैने वहा मेरी जगह किसी और अन्खिलि कली को दे  डाली, दुख नही खुद के पुष्प बन कर टूट कर बिखर जाने का, दुख तो है किस  कदर अपनो ने ही मेरी ज़िंदगी यू उज़ाद डाली, कभी सीने से लगा क रखते थे वो मुझे आज अपनी ज़िंदगी से मेरी हर  याद भी मिटा डाली,मेरी हर  याद भी मिटा डाली, मेरी हर  याद भी मिटा डाली, मेरी हर  याद भी मिटा डाली,

Sunday, 1 June 2014

जीना सीख लिया

ज़माने से मुझे हर दफा ज़ख्म मिले की मैंने उन्हें ही अपने जीने की वज़ह बना लिया, दुनिया से मुझे धोखे बार-बार मिले की अब उन्हें ही अपनी ज़िन्दगी बना लिया, लोगों से प्यार की जगह ज़हर हर बार मिले की अब उन्हें पी कर ही मैंने जीना सीख लिया