Wednesday, 6 August 2014

दिल में अभी यादे है बाकी तुम्हारी

"रब से बड़  कर थी दोस्ती तुम्हारी,
मोहब्बत से बड़ कर थी दोस्ती तुम्हारी,
देखा नही रब को मैने कही,
मिले थे जो तुम मुझे,
रब को था पाया मैंने  दोस्ती में तुम्हारी ,
वक्त का फेर है ये शायद,
कभी मिला कर दो अजनाबियो को दोस्त बनाता है,
और कभी दोस्त से  जुदा कर अजनबी बना देता है,
आज तुम नही हो पास हमारे कोई गम नही,
ज़िंदगी जीने के लिए इस दिल में अभी यादे है बाकी तुम्हारी"

क्या इसी के लिये ही दोस्ती तुमने हमसे की थी

तुम थे तभी तो महकती थी मेरी ये जिन्दगी 

तुम थे तभी तो थी इसमे हर खुशी 

क्यो बेवफा आशिक की तरह तुम भी बेवफा निकले

 तुमसे हमे ये उम्मी तो न थी 

भुला  के अपने वादे वफा के दूर एक दिन तुम हमसे चल दिये 

क्या इसी के लिये ही दोस्ती तुमने हमसे की थी

Thursday, 31 July 2014

मेरी रचनाए

1*"जिससे मिलन की बात हुई,

जिससे आँखे चार हुई,

वो हुए ना कभी ह्मारे

जिससे ज़िंदगी ये मेरी बर्बाद हुई(°_·°)"



2*"वो एक तरफ़ा प्यार कितना सुहाना था, 

ना कोई अरमान ना कोई बहाना था, 

मिलेंगे नही कभी हम उनसे, 

हो नही सकेंगे मिलन के साथ फेरे, 

नदी के दो किनरो सा जीवन हमारा था, 

रहे खुश सदा वो बस ये ही मकसद हमारा था, 

वो नही थे आशिक़ हमारे पर ये दिल सिर्फ़ उनका ही दीवाना था, 

वो एक तरफ़ा प्यार भी हाए कितना सुहाना था....."



3*ये माना आसमान के तारे को पाने की हसरत की है हमने, 

आज लाखो हैं उसके चाहने वाले है गुरूर उसे ये  खुद पर, 

पर एक दिन टूट कर गिरेगा वो ज़मीन पे राख बन कर,

 झोली फेला कर हम खड़े होंगे समेट कर उसे अपने सीने से लगाने के लिए, 

भूल जायंगे लोग उसे एक दिन राख उसके बन जाने पर, 

हम उस राख को भी सीने से लगा के रखेंगे मौत की आगोश में समाने तक ..... "

Monday, 28 July 2014

चलते हुए इन रास्तों पर

चलते हुए इन रास्तों पर मंज़िल यु ही नही मिल जाती,
पल दो पल के साथ से यु ही दोस्ती किसी से नहीं हो जाती,
यु तो सैकड़ों मिलते हैं जीवन की इस डगर में,
पर हर किसी से ज़िन्दगी की डोर तो नहीं जुड़ जाती।।

Friday, 25 July 2014

मेरी रचनाये

१*"
"पल दो पल की यारी थी उनकी, 
पल दो पल का रिश्ता था उनका, 
छोड़ गए मुझे आज यु  वो तनहा, 
उमर भर साथ निभाने का वादा था उनका"।





२*
"ज़िन्दगी की राहो में धोखे मुझे हर बार मिले, 
चलते हुए राहो में काटे मुझे हर बार मिले, 
वफ़ा की बस एक हसरत थी मेरी इस जहाँ से, 
पर इस जहाँ में  बेवफा यार हर बार मिले"। 




Wednesday, 23 July 2014

कैसे भुला देते हैं लोग

कैसे भुला देते  हैं लोग किसी से दिल लगा कर,
कैसे भुला देते हैं लोग किसी के दिल में प्यार जगा कर,
हम तो यु ही नहीं भुला देते हर किसी को,
जाने कैसे भुला देते हैं लोग किसी के दिल में अपना आशियाना बना कर… 

Tuesday, 22 July 2014

ईश्वर वाणी -57

ईश्वर कहते हैं इस श्रष्टी में जो वो दिव्या जल है जिसमे समस्त ग्रह नक्शत्र विचरण करते हैं वो में ही तो हूँ, वो सब मुझमे ही तो समाए हैं, में ही स्वर्ग और मैं ही नरक हूँ, प्राणी के इस भोतिक स्वरूप के द्वारा जो भी कार्य वो करता है उसके उन्ही कार्यो के अनुसार में ही उसे स्वर्ग और नरग का मार्ग दिखा कर वो ही रूप उसे दिखलाता हूँ, 


ईश्वर बताते हैं स्वर्ग क्या है और नरक क्या है, ईश्वर कहते हैं जो पवन हैं, पवित्र, सच्चा है, जो अनेतिक्ता और हर तरह के व्याभिचार से कोषो दूर है, सभी प्राणियों को सुख एवम् सम्रधि देने वाला है वो स्वर्ग है,

इसके विपरीत जो हर तरह की बुराई से ओत प्रोत है, जहाँ दुआचरण, व्यभिचार, जलन, ईर्ष्या, पाप, एवं केवल स्वार्थवश अपने हित के लिए कार्य करने एवं अपने लिए ही सोचने जगह का नाम नरक है,


ईश्वर कहते हैं प्राणी अपने करमो के माध्यम से इसी मृत्यु लोक में ही स्वर्ग और नरक के दर्शन कर लेता है किंतु उसका हृद्या इतना मलिन हो चुका है की सब कुछ देख और जान कर भी वो कुछ नही समझता और बुरे कर्मों में लीन्न रहता है और अंततः नरक को प्राप्त करने का भागी बनता है,



ईश्वर कहते हैं ईश्वर को अपनी इन्ही आँखो से देखा जा सकता है किंतु उसके लिए प्राणी का हृदय पाक होने आती आवश्यक है, यदि मानव चाहे जितनी भी पूजा-भक्ति और उपवास आदि रख ले यदि उसका मॅन मलिन है तो ऐसा व्यक्ति कभी प्रभु को नही पा सकता, हो सकता है कुछ पल के लिए वो ईश्वर की कृपा पा भी ले किंतु आजीवन ईश्वर्िय कृपा के लिए प्राणी के हृदय को पाक होना आती आवशयक् है,



ईश्वर कहते हैं उस गगन में दिव्य सागर के रूप में मैं ही तो हूँ, मानव ने वाहा जा कर मुझे ढूँदने की चेष्टा की किंतु मैं उसे वाहा नज़र नही आया क्योकि मानव ने पूर्ण श्रीधहा से मुझे नही ढूडा, तमाम तारह के पाप के साथ वो मुझे ढूड़ने चला इसलिए ना तो उस दिव्या जल के रूप में उसे वाहा मिला और ना ही उस रूप में जिस रूप में मानव मेरी पूजा करता है,


ईश्वर कहते हैं जिस दिन मानव कलियुग के चक्र से आज़ाद हो कर निःस्वार्थ भाव से मुझे ढूँदने का प्रयास करेगा उस दिन मैं उसे उसकी मृत्यु से पूर्वा आवश्या मिलूँगा, उसी दिन मानव आकाश में बिखरा वो दिव्या जल भी देख सकेगा जो समस्त ग्रह-नक्षत्रो को अपने में लिए इस अंतरिक्ष में तेरा रहा है क्योंकि वो दिव्य जल में ही तो हूँ..