Saturday 10 February 2018

ईश्वर वाणी-230 मासिक चक्र

ईश्वर कहते है, "हे मनुष्यों आज तुम्हें मैं महिलाओं में होने वाले मासिक के विषय मे बताता हूँ, सदियों से विभिन्न सम्प्रदाय में ये धारणा है कि महिलाएं उन दिनों अशुद्ध होती है, उनके साथ अछूतो की भांति व्यवहार किया जाता है किंतु ईश्वर की दृष्टि में क्या वाकई एक स्त्री उन दिनों अशुद्ध होती है इसलिए किसी पूजा पाठ धार्मिक अनुष्ठान में शामिल नही हो सकती, व्रत उपवास नही कर सकती, धार्मिक स्थान नही जा सकती, धार्मिक पुष्तक नही पड़ सकती।

हे मनुष्यों एक स्त्री उन दिनों ऐसा नही कर सकती किंतु इसलिए नही की वो अपवित्र या अशुद्ध है, अपितु एक स्त्री खुद इतनी सक्षम है कि एक नया जीवन धरती पर ला सकती है।
अर्थात एक स्त्री जब मासिक चक्र में होती है तब वो समस्त देवो सहित ईश्वर की भी पूजनीय होती है, उसका स्थान सबसे श्रेष्ठ होता है। जैसे एक राजा राजगद्दी पर रहते हुये एक दरबान के आगे नही झुक कर नमस्कार कर सकता न ही वो दरबान की नौकरी का आवेदन कर सकता है, किंतु इसका अभिप्राय ये नही की राजा अशुद्ध या अपवित्र है जो वो ऐसा नही कर सकता।
ठीक हर स्त्री भी उन दिनों इतनी ही पवित्र होती है, जगत जननी जगदम्बा स्वरूप जगत जननी स्त्री होती है, यदि स्त्री को मासिक चक्र न हो तो सृष्टि में जीवन ही सम्भव नही है, एक स्त्री खुद में पूर्ण होती है किंतु पुरूष कभी खुद में पूर्ण नही। एक स्त्री हर पुरुष में शक्ति रूप में विराजित है किंतु पुरुष स्त्री में शामिल नही है।ठीक स्त्री बिना पुरुष के एक संतान को एक जीवन की धरती पर ला सकती है उदाहरण-माता कुंती, माता मरियम, इन्होंने बिना किसी पुरूष के एक जीवन को धरती पर जन्म दिया, इसलिए एक स्त्री को ही जगत जननी कहा जाता है, संसार में मेरे स्वरूप को छोड़कर कोई ऐसा पुरूष नही जिसने बिना नारी के किसी नवजीवन को जन्म दिया हो।
हे मनुष्यों ऐसा नही केवल मनुष्यों की स्त्री ही पूजनीय है अपितु संसार मे जितने भी प्राणी है उनकी आधी संख्या नारी की है और सभी पूजनीय है।
हे मनुष्यों कुछ धूर्त, कुटिल, कपटी, नारी विरोधी व्यक्तियों ने नारी को दोयम, नीच, दबाने, शोषण करने हेतु साथ ही पुरूष को अधिक प्रधनता दे उनको अधिक महत्व देने हेतु ये भरम फैला दिया कि नारी उन दिनों अपवित्र अशुद्ध होती है, एक माता का रक्त जो एक नया जीवन प्रदान करता हो वो अशुद्ध वो नारी अपवित्र कभी नही हो सकती अपितु वो तो मुझसे भी पूजनीय होती है, अपनी ज़िंदगी को खतरे में डाल एक जीवन को वो संसार मे लाती है, ऐसा साहस तो मुझमें भी नही।

हे मनुष्यों नारी को सम्मान दो न कि उसे अपवित्र बता उसका अपमान करो, यदि तुम ऐसा करते हों, उसके मासिक चक्र के दैरान उसके साथ अछूता अपवित्र जैसा व्यवहार करते हो तो निश्चय ही मेरे क्रोध के भागी बनते हो।"
कल्याण हो

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